नई दिल्ली. मशहूर गीतकर संतोष आनंद का लिखा और लता जी का गाया “कुछ पाकर खोना है
कुछ खोकर पाना है, जीवन का मतलब तो आना और जाना है दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है ज़िंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है” शोर फिर के गाने की ये लाइनें भले इशान किशन का पसंदीदा गाना नहीं हो लेकिन इन पंक्तियों का भाव उनके करियर की कहानी पर सटीक बैठता है. पटना के 27 वर्षीय विकेटकीपर-बल्लेबाज ने उस दौर से वापसी की जब भारतीय क्रिकेट जगत उनसे उम्मीद छोड़ने लगा था.
ऋषभ पंत टी20 विश्व कप विजेता टीम में वापसी कर चुके थे, ध्रुव जुरेल प्रभावी प्रदर्शन कर रहे थे, संजू सैमसन हमेशा की तरह दावेदार थे और जितेश शर्मा भी अपनी उपयोगिता साबित कर रहे थे. ऐसे में चयन क्रम में पांचवें स्थान पर खड़े किशन के लिए राह लगभग बंद दिख रही थी. आक्रामक शैली के इस बल्लेबाज के लिए लगातार अनिश्चितता के सहारे जीवन बिताना आसान नहीं था. किशन ने मानसिक थकान के चलते ब्रेक लेने का फैसला किया लेकिन इसके बाद उन्हें चयन से बाहर किया गया, केंद्रीय अनुबंध रद्द हुआ और उन पर घरेलू क्रिकेट को लेकर गंभीर नहीं होने के आरोप लगे.
2 साल पहले शुरु हुई वापसी की तैयारी
उनके करीबी मित्र ने बताया कि कैसे अगले ही दिन से लोगों ने मान लिया कि वह क्रिकेट को लेकर गंभीर नहीं हैं. तरह-तरह की बातें लिखी गईं किशन ने हालांकि इन बातों पर कभी प्रतिक्रिया नहीं दी. मुस्कुराते रहे और मेहनत करते रहे. वर्तमान में जीना कठिन होता है, लेकिन उन्होंने इस प्रक्रिया को सर्वोपरि मान लिया. अंशुमत के अनुसार, आज आप जो पाकिस्तान के खिलाफ देख रहे हैं, वह दो साल पहले शुरू की गई प्रक्रिया का परिणाम है. ये रन उस प्रक्रिया का एक हिस्सा है. अंशुमत पटना स्थित ‘इशान किशन क्रिकेट अकादमी’ के सह-संस्थापक भी हैं और इस दौरान उनकी मेहनत के साक्षी रहे.
परछाई बना परिवार
इस मुश्किल दौर में अंशुमत के अलावा किशन के परिवार और करीबी लोगों का सुरक्षा घेरा बना रहा. पिता प्रणव पांडेय, बड़े भाई और चिकित्सक राज किशन ने उन्हें भावनात्मक संबल दिया. किशन की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई और बेहतर एकाग्रता के लिए उन्होंने ध्यान शुरू किया. पिता की सलाह पर भगवद गीता पढ़नी शुरू की. अभ्यास के लिए वह नियमित तौर पर दिन में दो बार अपनी अकादमी जाते. पोषण पर ध्यान देने के लिए निजी शेफ रखा और बाहर का खाना छोड़ दिया. नींद और आराम की निगरानी भी व्यवस्थित ढंग से की गई. भले ही किशन ने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन भारतीय क्रिकेट के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर उठे सवाल उन्हें आहत कर गए थे.
मस्तमौला सोच ने की मदद
अंशुमत ने कहा, ‘‘ब्रेक के दौरान वह मानसिक रूप से थके हुए थे और उन्हें विश्राम की जरूरत थी और उन्होंने इसे अपने तरीके से संभाला. यह कभी लक्ष्य नहीं रहा कि रणजी, सैयद मुश्ताक अली या विजय हजारे ट्रॉफी में इतने रन बनाने हैं. न्यूजीलैंड श्रृंखला और घरेलू क्रिकेट में उनका औसत शानदार रहा. मिलनसार और खुशमिजाज स्वभाव के किशन टीम माहौल को हल्का बनाए रखना पसंद करते हैं.
भाई बना भगवान
अंशुमत कोलंबो सिर्फ पाकिस्तान मैच देखने नहीं, बल्कि अपने इस ‘भाई’ के साथ रहने भी पहुंचे. उन्होंने कहा, वह मजाक करना और हंसी-मजाक से माहौल हल्का रखना पसंद करते हैं. हल्के-फुल्के स्वभाव को अक्सर गंभीरता की कमी समझ लिया जाता है, लेकिन यह सिर्फ धारणा है. पाकिस्तान के खिलाफ कठिन परिस्थितियों में रन बनाने के बाद होटल लौटते ही उन्होंने सबसे पहले रिकवरी पर ध्यान दिया, क्योंकि बुधवार को नीदरलैंड के खिलाफ मैच है. पटना में अकादमी में किशन के अभ्यास के दौरान उनके बड़े भाई राज किशन का विशेष योगदान रहा. अंशुमत ने कहा, “राज ने जूनियर क्रिकेट खेला है और अब चिकित्सक हैं. किशन के खेल को उनसे बेहतर कोई नहीं समझता और उनकी सलाह अहम रहती है किशन ने अकादमी में घंटों की ‘सिमुलेशन यानि मैच जैसी परिस्थितियां तैयार कर अभ्यास कर अपनी खामियों को दूर किया.
नेट्स पर मैच वाली परिस्थिति
अंशुमत ने कहा, “न्यूजीलैंड और पाकिस्तान के खिलाफ जो दिखा, वह स्पष्टता का परिणाम है. नेट सत्र में सैकड़ों बार अलग-अलग परिस्थितियों का अभ्यास किया गया. वह पावरप्ले में कितने रन, कितनी गेंदों में लक्ष्य हासिल करना है जैसे परिस्थितियों को मन में रख कर अभ्यास करते थे. यह सब मानसिक तैयारी का हिस्सा था. अंशुमत ने कहा, “किशान ने मेहनत को उम्मीदों से जोड़ना छोड़ दिया है. जब उन्होंने झारखंड की कप्तानी की, तब भी उनके मन में कभी यह विचार नहीं आया कि ऐसे खेलूंगा या ऐसी कप्तानी करूंगा तो वापसी होगी.