धार कलेक्टर का वादा- सहमति बिना काम नहीं होगा: 30 दिन बाद ही पहुंची ड्रिलिंग मशीनें; इसलिए कुक्षी में सुलग उठा आदिवासियों का गुस्सा – Madhya Pradesh News

धार कलेक्टर का वादा- सहमति बिना काम नहीं होगा:  30 दिन बाद ही पहुंची ड्रिलिंग मशीनें; इसलिए कुक्षी में सुलग उठा आदिवासियों का गुस्सा – Madhya Pradesh News




मध्य प्रदेश के धार जिले का कुक्षी क्षेत्र दो दिन पहले अचानक रणक्षेत्र में बदल गया। राजस्थान की श्री सीमेंट कंपनी के लिए प्रस्तावित चूना पत्थर खदान का सर्वे करने पहुंची प्रशासन और पुलिस की टीम पर ग्रामीणों ने हमला बोल दिया। 9 थानों की फोर्स तैनात थी, लेकिन गुस्साई भीड़ के सामने हालात काबू में नहीं रहे। तहसीलदार की गाड़ी को घेरकर पलटने की कोशिश हुई, वाहनों पर पथराव हुआ, कांच टूटे और अफरा-तफरी के बीच सर्वे टीम को मशीनें छोड़कर भागना पड़ा। घटना के अगले दिन भास्कर की टीम खेड़ली गांव पहुंची। यहां ग्रामीणों से बात की तो उन्होंने कहा कि प्रशासन ने भरोसा दिया था कि कुछ नहीं होगा, मगर सर्वे के लिए मशीनें भेज दी। आखिर प्रशासन ने क्या भरोसा दिया था और वादा खिलाफी क्यों कर दी? आखिर ग्रामीण खदान का विरोध क्यों कर रहे हैं। इन सवालों का जवाब तलाशने भास्कर की टीम ने मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट… लोगों को लगा सर्वे की टीम आ गई
जैसे ही हमारी गाड़ी रुकी, कुछ महिलाएं और युवक सतर्क होकर आगे बढ़े। उनके चेहरे पर डर साफ था। उन्हें लगा शायद सर्वे के लिए फिर से टीम आ गई है। जब उन्हें बताया गया कि हम भास्कर से हैं और घटना के बारे में जानने आए हैं, तो माहौल थोड़ा सहज हुआ। बातचीत शुरू होते ही गांव के लोगों ने पहला सवाल यही उठाया- ‘एक महीने पहले कलेक्टर साहब आए थे, तब तो कहा था बिना सहमति कुछ नहीं होगा, फिर पुलिस और मशीन क्यों भेज दी?’ भास्कर की टीम जब मौके पर पहुंची तो खेत के पास ड्रिलिंग मशीन खड़ी थी, लेकिन उसके कुछ पुर्जे निकाले जा चुके थे। सड़क किनारे पुलिस की बैरिकेडिंग बिखरी पड़ी थी। जमीन पर टूटे कांच चमक रहे थे। इधर-उधर पड़े पत्थर बता रहे थे कि यहां एक दिन पहले कितना उबाल रहा होगा। दूर घरों की ओट से ग्रामीण हमें देख रहे थे। कुछ लोग पेड़ों के पीछे खड़े थे। माहौल में सन्नाटा था, लेकिन भीतर बेचैनी साफ दिख रही थी। जानिए… ग्रामीण किस वादाखिलाफी की बात कर रहे
जयस के रविराज बघेल बताते हैं कि घटना के 1 महीने पहले 13 जनवरी को कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ग्राम मोगरा पहुंचे थे। यहां उन्होंने प्रभावित गांवों के लोगों से चर्चा की थी। हम लोगों ने कलेक्टर से कहा था कि हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम ऐसा विकास नहीं चाहते हैं कि जो आदिवासी की मौत पर उसकी कब्र खोदे, ऐसे विकास से पर कतई हम समझौता नहीं करेंगे। तब कलेक्टर ने कहा था कि कि आपकी बात बिल्कुल सही है। मैं खुद इन सब चीजों के बारे में बहुत सोचता हूं। हम विकास किसको मानते हैं? अभी मैं जनसुनवाई करके आया हूं। मुझे सबसे अधिक संख्या में पंचायतों से, सरपंचों से यह ज्ञापन मिला कि यहां से यहां तक की सड़क बनाइए, यह पुलिया बनाइए। हमारे लोगों, बच्चों को आने-जाने में आसानी होनी चाहिए, गर्भवती माताओं को आने-जाने में आसानी होनी चाहिए। पुलिया किससे बनेगी? सीमेंट से बनेगी और किस चीज से बनेगी? सीमेंट कहां बनेगा? फैक्ट्रियों में बनेगा। मैं कह रहा हूं कि सीमेंट कोई भी कंपनी बनाए एबीसीडी…मुझे उससे मतलब नहीं है। जो संसाधन देश के लिए जरूरी हैं, वह कहीं ना कहीं से तो निकलेंगे। सीधी सी बात है कि विकास के लिए ही यह सब हो रहा है। आपके मन मस्तिष्क में जो भी संदेह है, उसे दूर करेंगे। उसके बाद ही आगे कोई काम होगा। इसका तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है कि सहमति के बिना कोई काम होगा। फिर क्यों भड़का आदिवासियों का गुस्सा?
विवाद की जड़ में 1728 हेक्टेयर जमीन और लगभग 35-40 गांवों का अस्तित्व है। खनिज विभाग ने राजस्थान की श्री सीमेंट कंपनी को 11 मार्च 2025 से 3 साल के लिए लीज दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना ग्राम सभा की अनुमति के प्रशासन ‘तानाशाही’ पर उतर आया है। सरपंच संघ का आरोप – दहशत फैलाकर सर्वे करना चाहती है सरकार
कुक्षी सरपंच संघ अध्यक्ष विजय सिंह रावत ने भास्कर को बताया कि प्रशासन ने धोखे से कार्रवाई की। न ग्राम पंचायत को सूचना दी, न पटेलों को बताया। अचानक 9-10 थानों की फोर्स भेजकर ग्रामीणों में दहशत फैलाई गई। जब कलेक्टर साहब ने मोगरा में आश्वासन दिया था कि सहमति बिना काम नहीं होगा, तो यह वादाखिलाफी क्यों की? इंजीनियर बोले – तुम्हारा कोई अधिकार नहीं
ग्रामीण अंकित बघेल ने मौके पर हुई बहस का ब्यौरा देते हुए बताया कि हमने सिर्फ इतना पूछा कि बिना ग्राम सभा के आदेश के आप हमारे खेतों में कैसे घुस आए? तो वहां आए इंजीनियर और अधिकारियों ने बदतमीजी की। बुजुर्ग बोले- पुरखों की जमीन है, मर जाएंगे पर छोड़ेंगे नहीं
ग्रामीण सरदार सिंह सोलंकी की आंखों में अपनी जमीन खोने का डर साफ दिखा। कहा कि ये हमारे पुरखों की जमीन है। कलेक्टर साहब हमें झूठा आश्वासन देते रहे और पीछे से मशीनें खेड़ली में घुसा दीं। विकास के नाम पर गांव के गांव उजाड़ देंगे, तो हम अपने बच्चों और मवेशियों को लेकर कहां जाएंगे? हमें ऐसा विनाशकारी विकास नहीं चाहिए। गांव में चर्चा- राजस्थान की कंपनी को शरण न दें
ग्रामीणों में श्री सीमेंट कंपनी के कर्मचारियों को लेकर भी भारी नाराजगी है। ग्राम तलावड़ी के अश्विन बघेल ने समाज से अपील की है कि जो लोग हमारे गांव उजाड़ने आ रहे हैं, उन्हें कोई भी ग्रामीण शरण न दे। अगर प्रशासन जबरदस्ती करेगा और इन कर्मचारियों के साथ कुछ गलत होता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। हम अपनी ज़मीन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। जयस की चेतावनी- आदिवासियों की कब्र खोदने वाला विकास
जयस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रविराज बघेल ने सीधे तौर पर प्रशासन को घेरा। उन्होंने कहा, यह पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून का खुला उल्लंघन है। इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी बड़ा सवाल – अब आगे क्या?



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