Last Updated:
Sagar Anokhi Holi: बुंदेलखंड में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अनोखी परंपराओं और आस्था का संगम है. यहां कई घरों में छोटी होलिका जलाई जाती है और नई अग्नि लाने की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है. गौशालाओं की रक्षा के लिए गोबर से बने सूरज, चांद और तारे दरवाजे पर बांधे जाते हैं. माना जाता है कि इससे बुरी शक्तियां दूर रहती हैं और परिवार व पशुधन सुरक्षित रहता है. जानिए सागर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में मनाई जाने वाली इस अनोखी होली की पूरी कहानी.
Holika Dahan Rituals: रंगों का त्योहार होली अब बस आने ही वाला है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई उत्साह में है. लेकिन बुंदेलखंड में होली सिर्फ रंग और गुलाल तक सीमित नहीं है, यहां इससे जुड़ी कई अनोखी परंपराएं आज भी जिंदा हैं. यहां एक खास मान्यता है सिर्फ मोहल्ले या गांव में ही नहीं, बल्कि कई घरों में छोटी होलिका भी जलाई जाती है. माना जाता है कि हर घर में कोई न कोई सदस्य ऐसा होता है जिसकी नकारात्मकता या बुरी आदतों को इस अग्नि से दूर किया जा सकता है. इसलिए घर के आंगन में छोटी होलिका दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है.
नई अग्नि लाने की पुरानी रीत
पहले के जमाने में बार-बार आग जलाने के साधन नहीं होते थे. सागर की बुजुर्ग दादी द्रोपति बाई बताती हैं कि एक बार आग जलाई जाती थी तो उसे चूल्हे या सिगड़ी में इस तरह दबाकर रखा जाता था कि वह कई दिनों तक जलती रहे. होली के समय नई अग्नि लाने के लिए गोबर की “मलिया” बनाई जाती हैं. ये 5, 11, 21 या 51 की विषम संख्या में होती हैं. इन्हें धागे में पिरोकर माला बनाई जाती है और ऊपर सफेद झंडी लगाई जाती है. फिर होलिका दहन की आग लाकर इन्हें जलाया जाता है. इसी आग से घर में नई शुरुआत मानी जाती है.
गोबर के सूरज-चांद से गौशाला की रक्षा
बुंदेलखंड के गांवों में आज भी ज्यादातर घरों में गौशाला होती है. यहां होली से करीब 10 दिन पहले से ही गोबर के सूरज, चांद, तारे और ग्रह बनाना शुरू कर दिया जाता है. जब ये सूख जाते हैं तो धागे में पिरोकर गौशाला के दरवाजे के ऊपर बांध दिए जाते हैं. मान्यता है कि इससे बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियां अंदर नहीं आतीं. मवेशी स्वस्थ रहते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है. होली के अगले दिन गायों को रंग लगाया जाता है. पुराने गोबर के प्रतीकों को उतारकर गमले में डाल दिया जाता है और नए पूरे साल के लिए लगा दिए जाते हैं.
आस्था, प्रकृति और परंपरा का संगम
बुंदेलखंड की ये परंपराएं सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति और पशुधन से जुड़ी संवेदनशील सोच को भी दिखाती हैं. यहां होली का मतलब सिर्फ रंग नहीं, बल्कि घर-परिवार और पशुओं की खुशहाली की कामना भी है. यही वजह है कि बदलते समय के बावजूद ये परंपराएं आज भी गांवों में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं.
About the Author
Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें