सीहोर में पांच दिवसीय होली महापर्व की शुरुआत एक अनूठी और संवेदनशील परंपरा ‘गमी की होली’ के साथ हुई है। मंगलवार को शहर और ग्रामीण अंचलों में फाग मंडलियों ने उन घरों में पहुंचकर रंग-गुलाल लगाया, जहां बीते साल किसी सदस्य का निधन हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य शोक संतप्त परिवारों को दुख के माहौल से बाहर निकालकर दोबारा खुशियों और सामाजिक उल्लास से जोड़ना है। इस सालों पुरानी परंपरा के तहत फाग मंडलियां ढोलक, नगाड़िया, झांझ और मंजीरों की थाप पर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए गमी वाले परिवारों के घर पहुंचती हैं। वहां वे परिवार के सदस्यों को मर्यादित तरीके से रंग लगाकर उन्हें त्योहार की खुशियों में वापस लौटने का सकारात्मक संदेश देती हैं। मंगलवार को पूरे सीहोर नगर सहित ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा पूरी आत्मीयता के साथ निभाई गई। पहले दिन नहीं खेली जाती सामान्य होली सीहोर की यह विशेष परंपरा है कि यहां रंगोत्सव के पहले दिन सार्वजनिक रूप से सामान्य होली नहीं खेली जाती। पहला दिन पूरी तरह से ‘गमी की होली’ के लिए ही आरक्षित रहता है। गमी वाले परिवारों को रंगने के बाद, दूसरे दिन से पूरे क्षेत्र में धूमधाम से होली मनाई जाती है और लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर बधाइयां देते हैं। रंग पंचमी तक चलता है 5 दिवसीय उल्लास आधुनिकता के इस दौर में भी सीहोर के लोग अपनी इस संवेदनशील और सामाजिक समरसता वाली परंपरा का पूरी शिद्दत से निर्वहन कर रहे हैं। इस क्षेत्र में होली से लेकर रंग पंचमी तक यह पांच दिवसीय त्योहार बड़े ही उत्साह और पारंपरिक मान्यताओं के साथ मनाया जाता है।
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