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Khandwa News: प्रशांत मुकाती ने लोकल 18 से कहा कि इससे पहले उन्होंने प्याज की खेती की थी, उसमें भी भाव नहीं मिला था. आलू से उम्मीद थी लेकिन यहां भी नुकसान ही हुआ. गांव के कई किसानों की यही हालत है. नई फसल लगाने के बावजूद सही दाम नहीं मिल रहे, जिससे किसान आर्थिक दबाव में आ गए हैं.
खंडवा. जिस आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है, वही इस बार किसानों के लिए नुकसान का सौदा बन गया है. हर घर की रसोई में इस्तेमाल होने वाला आलू इन दिनों मंडियों में औने-पौने दाम पर बिक रहा है. हालात ये हैं कि थोक मंडी में आलू 6 से 7 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है जबकि बाजार में यही आलू 10 से 12 रुपये किलो तक पहुंच रहा है. बीच का फर्क व्यापारियों के पास जा रहा है और किसान लागत निकालने के लिए जूझ रहे हैं. मध्य प्रदेश के खंडवा जिला सहित निमाड़ क्षेत्र में इस बार आलू का रकबा बढ़ा था. अच्छी पैदावार की उम्मीद में किसानों ने बड़े पैमाने पर बोवनी की लेकिन जब फसल मंडी पहुंची, तो दाम गिर गए. जिन किसानों ने पहली बार आलू लगाया था, वे सबसे ज्यादा परेशान हैं.
लोकल 18 से बातचीत में खंडवा के भगवानपुरा गांव के किसान प्रशांत मुकाती ने बताया कि उन्होंने पहली बार एक एकड़ में आलू की खेती की. करीब 10 क्विंटल बीज डाला. खाद, पानी, दवाइयां, मजदूरी और ट्रांसपोर्ट मिलाकर कुल लागत 35 से 36 हजार रुपये तक पहुंच गई. फसल निकली करीब 60 क्विंटल लेकिन मंडी में भाव मिला मात्र 6 रुपये किलो. हिसाब लगाया जाए, तो कुल आमदनी करीब 36 हजार रुपये के आसपास ही रही. यानी जितनी लागत लगी, उतनी ही वसूली हुई. न मुनाफा, न बचत. किसान कहते हैं कि इतनी मेहनत के बाद भी फायदा नहीं होना बेहद निराशाजनक है.
पहले प्याज और अब आलू
प्रशांत मुकाती आगे बताते हैं कि इससे पहले उन्होंने प्याज की खेती की थी, उसमें भी भाव नहीं मिला. अब आलू से उम्मीद थी लेकिन यहां भी नुकसान ही हाथ लगा. गांव के कई किसानों की यही स्थिति है. नई फसल लगाने के बावजूद उचित दाम नहीं मिल रहे, जिससे किसान आर्थिक दबाव में आ गए हैं. इस साल आलू का उत्पादन ज्यादा हुआ लेकिन मांग के मुकाबले आपूर्ति बढ़ने से दाम गिर गए. किसान कहते हैं कि अगर यही हाल रहा, तो अगली बार आलू की खेती करने से पहले 100 बार सोचना पड़ेगा.
समर्थन मूल्य या अन्य राहत उपायों पर विचार
किसानों का सवाल है कि जब बाजार में आलू 10 से 12 रुपये किलो बिक रहा है, तो उन्हें 6 रुपये ही क्यों मिल रहे हैं. सरकार को समर्थन मूल्य या अन्य राहत उपायों पर विचार करना चाहिए ताकि किसानों को कम से कम लागत का उचित लाभ मिल सके. फिलहाल ‘सब्जियों का राजा’ कहलाने वाला आलू किसानों की आंखों में आंसू ला रहा है. अब देखना होगा कि सरकार और प्रशासन किसानों को इस संकट से उबारने के लिए क्या कदम उठाते हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.