वूमंस डे- पढ़ाई की, परीक्षा दी, नहीं मिली नौकरी: जबलपुर की युवती ने खुद का व्यवसाय शुरू, अब 50 महिलाओं को भी देती हैं रोजगार – Jabalpur News

वूमंस डे- पढ़ाई की, परीक्षा दी, नहीं मिली नौकरी:  जबलपुर की युवती ने खुद का व्यवसाय शुरू, अब 50 महिलाओं को भी देती हैं रोजगार – Jabalpur News




पोस्ट ग्रेजुएशन, लॉ और पीएचडी करने के बाद भी जब एक युवती को नौकरी नहीं मिली तो उसने सारी मार्कशीट, दस्तावेजों को पेटी में रखते हुए कहा कि इतनी पढ़ाई करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। अब जिंदगी भर की ये मेहनत रद्दी से कम नहीं है। जबलपुर के रांझी में रहने वाली गरिमा चौधरी ने खुद का रोजगार स्थापित किया। एक साल के भीतर गरिमा ना आत्मनिर्भर बन गई, बल्कि उसने आसपास रहने वाली 50 से अधिक महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ लिया। 15 से ज्यादा बार दी परीक्षा, नहीं मिली सफलता गरिमा चौधरी ने बीए से ग्रेजुएशन करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आगे भी पढ़ाई जारी रखी। उसने एक नहीं, दो नहीं बल्कि 15 से अधिक बार शासकीय नौकरी के लिए इग्जाम और इंटरव्यू दिए, पर सफलता कहीं से भी हाथ नहीं लगी। इतना सब होने के बाद भी वो निराश नहीं हुईं। 2017 में एलएलबी कंपलीट की। फिर इतिहास से पीएचडी। गरिमा का कहना है कि इतना पढ़ने के बाद भी शासकीय नौकरी नहीं मिली। हिम्मत नहीं हारी चाहे सरकारी हो या फिर प्राइवेट हर सेक्टर में जॉब तलाश की, मिली तो गरिमा के एजुकेशन के विपरीत थी। पिता का देहांत होने के बाद गरिमा के सामने मां की सेवा करने के साथ-साथ घर चलाने की भी जिम्मेदारी आ गई। बड़ा भाई है। जब कहीं पर भी कुछ काम नहीं मिला तो गरिमा ने स्वयं का व्यवसाय करना शुरू कर दिया। बाजार से कच्चा माल (सूट का कपड़ा) लाकर घर पर ही उसे तैयार करने लगी। आसपास रहने वाली महिलाओं को पता चला तो उससे संपर्क किया। आज गरिमा के साथ 50 से अधिक वो महिलाएं जुड़ी हैं। वे भी हर माह 8 से 10 हजार रुपए घर पर काम करते हुए कमा रही हैं। अब नहीं करनी नौकरी गरिमा का कहना है कि 2015-16 में एसआई की परीक्षा दी थी, रिजल्ट व्यापमं फर्जीवाड़े की भेंट चढ़ गया। उसके बाद भी परीक्षा दी, पर सफलता हासिल नहीं हुई। अब कपड़े का व्यवसाय ही सब कुछ है। गरिमा का मानना है कि जितनी सैलरी उसे नौकरी से मिलती है, उतना तो वो घर बैठे कपड़े के व्यावसाय में कमा ही रहीं है, इसके साथ ही उन महिलाओं को भी रोजगार दे रही है, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। गरिमा रोजाना ही जबलपुर से सूट का कपड़ा लेकर आती है, और फिर अपने गुप की महिलाओं को देती है। सूट जब तैयार हो जाता है, तो उसे थोक व्यापारी को देती है। गरिमा का कहना है कि उसका परिवार अभी खुशहाल जिंदगी जी रहा है, इसके साथ ही गुप से जुड़ी महिलाएं भी रोजगार पाकर खुश है।



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