कार में 70 खोपड़ी, लाखों फॉलोअर्स, सबसे कम उम्र की महामंडलेश्वर, जानें कौन हैं किन्नर माता?

कार में 70 खोपड़ी, लाखों फॉलोअर्स, सबसे कम उम्र की महामंडलेश्वर, जानें कौन हैं किन्नर माता?


Ujjain News: उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान की सन्नाटे भरी रात, चारों ओर जलती चिताओं की राख और तंत्र-मंत्र की गूंज के बीच जब लोकल 18 की टीम पहुंची तो एक रहस्यमयी साधना चल रही थी. इसी श्मशान में ‘दिगंबर अघोरी किन्नर माता’ से लोकल 18 की मुलाकात हुई. ये वही किन्नर माता हैं, जो मात्र 27 साल में महामंडलेश्वर बनीं. किन्नर माता का ठिकाना कभी श्मशान तो कभी उनकी रहस्यमी कार होती है.

तंत्र साधना ही उनका जीवन है. बचपन में घर छोड़कर संन्यास का रास्ता चुनने वाली ये साध्वी आज सबसे कम उम्र की महामंडलेश्वर बन चुकी हैं. अंग्रेजी सहित 18 भाषाओं की जानकार किन्नर अघोरी साध्वी अनोखी वेशभूषा, रहस्यमयी जीवनशैली और सोशल मीडिया पर लाखों भक्तों के कारण देश-दुनिया में अलग पहचान बना चुकी हैं. लोकल 18 ने उनसे खास बातचीत की, जानें…

27 वर्ष की उम्र में कैसे बनीं महामंडलेश्वर?
फिर उन्होंने टीम को पूरा सच बताया. किन्नर अघोरी माता ने कहा, उनका नाम ‘श्री श्री 1008 मां काली नंद गिरि दिगंबर अघोरी माता’ है. 27 वर्ष की उम्र में वह देश की सबसे कम उम्र की किन्नर महामंडलेश्वर बनी हैं. वह तेलंगाना के मंचेरियल जिले से आती हैं. उन्होंने इंटरनेशनल किन्नर अखाड़े की आचार्या डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और मां सती नंद गिरि का आभार जताया. किन्नर माता ने कहा, अब “श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर” की उपाधि के साथ उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है, जिसे वह पूरी निष्ठा से निभाएंगी.

कैसे अघोर साधना के साथ किन्नर अखाड़े से जुड़ीं?
किन्नर अघोरी माता ने बताया, इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे 18 साल की कठिन और रहस्यमयी तपस्या है. 6 वर्षों तक उन्होंने तंत्र साधना सीखी और 12 साल काशी की गलियों में रहकर अघोरी मार्ग अपनाया. वहीं एक संत के माध्यम से उनकी मुलाकात सती नंद गिरि माता और इंटरनेशनल किन्नर अखाड़े की आचार्य लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से हुई. उनके आशीर्वाद और अपनी कठोर साधना के दम पर वह सबसे कम उम्र में महामंडलेश्वर बनने का दुर्लभ सम्मान हासिल कर पाईं.

तंत्र साधना में PhD? 
उन्होने बताया, मेरा जन्म तेलंगाना में हुआ. लेकिन, मेरा उज्जैन से गहरा नाता है. मेरे सभी भक्तों का मार्गदर्शन यहीं से होता है. इस पहचान तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था. बचपन में ही उन्होंने घर-परिवार छोड़कर संन्यास का रास्ता चुन लिया. अघोरियों से प्रभावित होकर वे अलग जीवन जीने लगीं. उन्होंने बताया, नग्न अवस्था में घूमती. लाली-लिपस्टिक मेकअप लगाती तो लोग अपशब्द कहते थे. मेरे पहनावे और साधना के तरीके को देखकर अक्सर मजाक उड़ाते थे.

जीवन में सबसे बड़ा बदलाव कब आया?
समाज की बातों से परेशान होकर वह एक दिन असम के कामाख्या धाम पहुंच गईं. उन्होने बताया, यहीं से उनकी जिंदगी ने रहस्यमयी मोड़ लिया. उन्हें एक ऐसे गुरु मिले जिन्होंने छह साल तक उन्हें तंत्र साधना की कठिन और गूढ़ विद्या सिखाई. इस साधना के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां भी आईं जब जान पर बन आई, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. धीरे-धीरे तंत्र की इस राह पर उन्होंने इतनी गहराई से अध्ययन किया कि पीएचडी हासिल कर ली. अब 18 साल से अधिक समय से वे देश-दुनिया में भ्रमण कर रही हैं.

कहीं अपना घर बनाएंगी?
किन्नर अघोरी माता का स्थायी घर कोई आश्रम नहीं, बल्कि श्मशान की शांति और उनकी कार ही है. कहा, श्मशान की खामोशी और साधना की शक्ति ने ही उन्हें आज इस मुकाम तक पहुंचाया है. अब महामंडलेश्वर बनने के बाद उन्होंने उज्जैन में अपना आश्रम बनाने का संकल्प लिया है, जहां से उनकी रहस्यमयी साधना की कहानी एक नए अध्याय की ओर बढ़ेगी.

आप 18 भाषाओं की जानकार हैं, कहां सीखी?
किन्नर माता ने कहा, कभी स्कूल की चौखट तक नहीं देखी, लेकिन देश-दुनिया के भ्रमण और कठिन साधना के बीच उन्होंने कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया. शमशान की निस्तब्धता, तंत्र साधना और लंबी यात्राओं के दौरान उन्हें न सिर्फ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना आई, बल्कि 18 भारतीय और विदेशी भाषाओं की समझ भी विकसित हो गई. इनमें हिंदी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, गुजराती, ओड़िया, पंजाबी, असमिया और मराठी जैसी भाषाएं शामिल हैं. कहा, लगभग 10 भाषाएं आसानी से बोल और समझ सकती हैं. अघोरी साधना, श्मशान की रहस्यमयी रातें और दुनिया भर की यात्राओं ने उन्हें एक ऐसी पहचान दी, जो आम लोगों के लिए किसी रहस्यमयी कहानी से कम नहीं लगती.

सोशल मीडिया पर लाखों भक्त, कैसे?
आगे बताया, उन्हें दुनिया की पहली ‘किन्नर अघोरी लेडी’ के रूप में जाना जाता है. दावा किया कि अगर आप इंटरनेट पर “THE WORLD FIRST LADY KINNER दिगंबर अघोरी माता” सर्च करें, तो सबसे पहले उनकी ही तस्वीर सामने आती है. उनकी साधना केवल श्मशान की चिताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अब उनकी पहचान सोशल मीडिया तक भी पहुंच चुकी है. हर दिन वे अपनी तंत्र साधना और आध्यात्मिक अनुभवों से जुड़ा एक वीडियो साझा करती हैं, जिसे रोज लाखों व्यू मिलते हैं. उनके दो सोशल मीडिया अकाउंट हैं, जिन पर कुल मिलाकर करीब 60 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं.

आपकी कार में 70 खोपड़ी क्यों?
श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर मां काली नंद गिरि दिगंबर अघोरी माता बताती हैं कि उनके पास दो खास कार हैं, जिन पर मां काली की विशाल तस्वीर, नरमुंड के चित्र और आगे त्रिशूल लगा है. सबसे चौंकाने वाली बात ये कि उनकी एक कार के अंदर करीब 70 सिद्ध की हुई मानव खोपड़ियां रखी हैं, जिन्हें वे अपनी तांत्रिक साधना की शक्ति मानती हैं. तंत्र साधना के समय इन खोपड़ियों का विशेष महत्व होता है. हालांकि, माता कहती हैं कि यह किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि उनकी साधना और पहचान का हिस्सा हैं. उन्होंने कहा, आमतौर पर अघोरी परंपरा के अनुसार रहती हैं, लेकिन समाज में आने पर शेर की खाल जैसी वेशभूषा, 108 रुद्राक्ष और मुंड माला के साथ काले वस्त्रों में उनका रूप और भी रहस्यमय दिखता है.



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