चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर वासंती नवरात्र का आरंभ होता है। इस बार अधिक मास के होने के कारण तिथि के क्षय के दोष एवं शुक्ल पक्षीय वृद्धि के कारण वासंती नवरात्र का आरंभ 19 मार्च गुरुवार के दिन उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र मीन राशि के चंद्रमा की साक्षी में हो रहा है। इस बार नवरात्रि पूर्ण रूप से 9 दिन की होने चलते अलग-अलग नक्षत्र के साथ अलग-अलग प्रकार के योग संयोग बनेंगे।
ज्योतिषाचार्य पंडित अमर डिब्बेवाला ने बताया कि पंचक के चौथे नक्षत्र में होगा। नवरात्रि का आरंभ यह 5 गुना शुभ फल प्रदान करेगा। नवरात्रि के समय उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र का संचरण रहेगा। यह पंचक का नक्षत्र है। ऐसी मान्यता है कि पंचक का नक्षत्र 5 गुना शुभ फल प्रदान करता है। साधना उपासना एक समय की जाने वाली पांच समय का पुण्य प्रदान करेगी और दूज के दिन शुक्रवार को होने से रेवती नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। शुक्ल पक्ष की दूज के साथ में पंचक के पांचवें नक्षत्र का समापन या पूर्णता भी योगकारी तथा सिद्ध देने वाली मानी जाती है। तीन शताब्दी में कुल 10 बार बनता है इस प्रकार का योग
भारतीय ज्योतिष शास्त्र की मान्यता एवं ग्रह गोचर के गणितीय सिद्धांत की दृष्टि से देखे तो नवरात्रि का आरंभ मीन राशि के सूर्य, शनि, शुक्र की युति एवं कुंभ राशि के बुध, मंगल, राहु की त्रिग्रही यूतियों के संयुक्त अवस्था में रहेगा और गुरु से दृष्ट मंगल बुध राहु की युति के परिणाम भी अलग-अलग प्रकार से रहेंगे। ग्रहों के गणित के आधार पर देखें तो इस प्रकार के योग संयोग 300 साल में 8 या 10 बार ही उपलब्ध होते हैं। इस दृष्टि से यह विशिष्ट योग संयोग वाली भी है।
साधक-उपासक कर सकेंगे प्रकट साधना
देवी भागवत के अनुसार वर्ष भर में चार नवरात्र आते हैं, जिनमें से दो गुप्त और दो प्रकट होते हैं। गुप्त नवरात्र की श्रेणी में देखें तो आषाढ़ व माघ मास की नवरात्रि गुप्त नवरात्रि होती है। और प्रकट नवरात्रि की श्रेणी में देखे तो चैत्र मास व आश्विन मास को प्रकट नवरात्रि की श्रेणी में रखा गया है।साधक व उपासक के लिए विशिष्ट साधना उपासना की दृष्टि से यह मंगल कारी है।इस दृष्टि से गृहस्थों को भी साधना उपासना करनी चाहिए।
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