मांडू और आसपास के ग्रामीण अंचलों में गणगौर पर्व का उल्लास पर है। होली के दो दिन बाद से शुरू हुआ यह 16 दिवसीय अनुष्ठान माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव (ईसर) की भक्ति को समर्पित है। नगर के प्राचीन चतुर्भुज राम मंदिर सहित विभिन्न स्थानों पर महिलाओं ने मिट्टी के पात्रों में ज्वारे (जवारा) बोए हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बाड़ी’ या ‘खोर’ कहा जाता है। रात 9 बजे जवारा पूजन और मंगल गीत गूंजे प्रतिदिन रात 9 बजे महिलाएं और युवतियां पूर्ण श्रृंगार कर मंदिरों में एकत्रित हो रही हैं। ढोल-थाली की थाप पर ‘गौर-गौर गोमती ईसर पूजे पार्वती’ और ‘जवारे बोवण चाली रे’ जैसे पारंपरिक लोकगीतों के साथ ज्वारों की पूजा की जा रही है। इन गीतों के माध्यम से ईसर-गौरी के विवाह प्रसंगों का वर्णन और अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है। अटूट दांपत्य और हरियाली के प्रतीक ज्वारे मान्यता है कि ये ज्वारे माता पार्वती का प्रतीक हैं। महिलाएं प्रतिदिन नियम से इन ज्वारों को सींचती हैं और कई श्रद्धालु इस दौरान कठिन उपवास भी रखते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि निमाड़ और मालवा की समृद्ध लोक संस्कृति, नृत्य और संगीत का एक अनूठा संगम भी पेश करता है। 16 श्रृंगार और मेहंदी से सजा उत्सव गणगौर के अवसर पर युवतियां और महिलाएं विशेष रूप से मेहंदी लगाकर और रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर बाड़ी पूजन के लिए पहुंच रही हैं। 16 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु की प्रार्थना के साथ मनाया जा रहा है। पर्व के अंतिम दिनों में इन ज्वारों का भव्य चल समारोह निकालकर विसर्जन किया जाएगा।
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