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Gangour festival: मन्नतधारी लोग विसर्जन के दिन गांव के सभी रथों या मन्नत अनुसार रथों को नर्मदा घाट या जलाशयक के पास से अपने घर ले जाते हैं, वहां माता की खूब सेवा करते है. जोड़े जिमाते (खाना खिलाना) है. और अगले दिन धूमधाम के साथ नाचते गाते विसर्जन के लिए फिर जलाशय तक जाते हैं और माता रूपी ज्वारों का विसर्जन करते है.
खरगोन. गणगौर मध्य प्रदेश के निमाड़, मालवा सहित राजस्थान का सबसे बड़ा लोकपर्व माना जाता है. चैत्र नवरात्रि में आने वाले इस त्योहार का लोगों को पूरे साल इंतजार रहता है. गांव हो या शहर, हर जगह इसकी अलग ही रौनक दिखती है. माता के घर आने से पहले पूरे घर की सफाई की जाती है. रंग रोगन किया जाता है. घर घर उत्सव जैसा महिला बन जाता है. वहीं, पर्व के दौरान महिलाओं द्वारा पारंपरिक वेशभूषा पहनकर रोज शाम को झलारिया जाती है.
खास बात ये है कि, इस पर्व में कई अनोखी परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जो इसे बाकी त्योहारों से अलग बनाती हैं. इनमें सबसे अनोखी परंपरा रथ बोड़ाने की है. मन्नतधारी लोग विसर्जन के दिन गांव के सभी रथों या मन्नत अनुसार रथों को नर्मदा घाट या जलाशयक के पास से अपने घर ले जाते हैं, वहां माता की खूब सेवा करते है. जोड़े जिमाते (खाना खिलाना) है. और अगले दिन धूमधाम के साथ नाचते गाते विसर्जन के लिए फिर जलाशय तक जाते हैं और माता रूपी ज्वारों का विसर्जन करते है. निमाड़ में इस परंपरा को लेकर लोगों में गहरी आस्था है.
निमाड़ में कुछ इस तरह मानता है गणगौर
निमाड़ और मालवा में गणगौर को पूरी तरह लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत कृष्ण पक्ष की एकादशी को ज्वारे बोने के साथ होती है और समापन चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ज्वारा विसर्जन के साथ होता है. इस दौरान हर दिन अलग-अलग रस्में निभाई जाती हैं. इस साल खरगोन और आसपास के गांवों में 21 मार्च को माता रूपी ज्वारों को बाड़ी से सजे हुए रथों में श्रद्धालु घर ले जाएंगे. महिलाएं दो दिन तक गीत गाकर और पूजा करके शिव और गौरा की आराधना करेंगी.
बिना मंत्र के होती है पूजा
गणगौर की पर्व की खास बात यह है कि इसमें मंत्र या बड़े अनुष्ठान नहीं होते. यहां लोग अपनी लोक परंपरा और भाव से पूजा करते हैं. महिलाएं निमाड़ी बोली में गीत गाकर शिव और गौरा की आराधना करती है. इस दौरान घरों और मोहल्लों में एक साथ बैठकर पूजा की जाती है. यही कारण है कि यह पर्व लोगों को आलस में जोड़ने का काम भी करता है. हर उम्र के लोग इसमें शामिल होते हैं और एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं.
बेटी की तरह होती है गौरा की सेवा
इस पर्व में गौरा को बेटी और शिव को दामाद माना जाता है. मान्यता है कि शादी के बाद बेटी मायके आती है, तो उसका खास स्वागत होता है. इसी तरह गौरा के आने पर भी घरों में खुशी का माहौल रहता है. महिलाएं गौरा को सजाती हैं, उसके लिए पकवान बनाती हैं और गीतों के जरिए उसके मायके आने की खुशी जताती हैं. विदाई के समय भी भावुक माहौल बनता है, जैसे कोई बेटी अपने घर से विदा हो रही हो.
मन्नत पूरी होने पर बोड़ाते है रथ
इसमें रथ बोड़ाने की परंपरा सबसे खास मानी जाती है. जिन लोगों की मन्नत पूरी होती है, वे विसर्जन के समय रथ को रोककर अपने घर ले जाते हैं. वहां रथ और ज्वारों की सेवा की जाती है और पूजा की जाती है. जिनके रथ लेकर आते है उन्हें भोजन कराया जाता है. एक या दो दिन तक घर में भजन, पूजा और उत्सव चलता है. इसके बाद श्रद्धालु फिर से रथ को लेकर जलाशय पहुंचते हैं और विधि के साथ विसर्जन करते हैं.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें