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संतोष सिंह दीक्षित आज कृषि उपज मंडी में सहायक निरीक्षक के पद पर पदस्थ हैं. लेकिन यहां तक पहुंचने में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. उन्होंने कोर्ट में 8 साल की लंबी लड़ाई लड़ी. अब वह निर्धन गरीब और बेसहारा लोगों की पढ़ाई के लिए मदद भी करते हैं.
हर माता-पिता का सपना होता है कि बेटा सरकारी नौकरी करे और कई लोग इसके लिए प्रयास भी करते हैं, लेकिन उन्हें काफी जद्दोजहद करना पड़ती है. आज हम बात एक ऐसे शख्स की कर रहे हैं, जिनकी सरकारी नौकरी तो लग गई थी. लेकिन कुछ समस्याओं के कारण उनको नौकरी से निकाल दिया गया था. उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. आइए जानते हैं संतोष सिंह दीक्षित की कहानी.
आज संतोष सिंह दीक्षित रेणुका कृषि उपज मंडी में सहायक निरीक्षक के पद पर पदस्थ है. उनका कहना है कि मैने जीवन में काफी संघर्ष किया है. मेरे माता-पिता रिटायर प्रिंसिपल है. मेरा लोगों से भी यही संदेश है कि सभी लोग मेहनत करते रहिए आपको सफलता जरूर मिलेगी.
संतोष सिंह को दो बार नौकरी से हटाया गया
लोकल 18 की टीम ने खंडवा रोड स्थित कृषि उपज मंडी में सहायक निरीक्षक के पद पर पदस्थ संतोष सिंह दीक्षित ने जानकारी देते हुए बताया कि मैने बीएएससी एमबीए एम ए सोल लॉजी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 12 दिसंबर 1994 को कृषि उपज मंडी में दैनिक वेतन भोगी के पद पर में पदस्थित हुआ. 2001 मैं मुझे कम से हटा दिया गया. मैंने कोर्ट के दरवाजे खटखटाए और 3 साल तक लड़ाई लड़ी उसके बाद मुझे न्याय मिला फिर 2008 में मुझे हटा दिया. फिर मैंने लड़ाई लड़ी और 5 साल बाद मुझे नियमित किया गया.
8 साल तक खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
संतोष ने यह भी बताया कि जब मुझे काम से हटा दिया जाता था, तो मुझे अपने परिवार का पालन पोषण करना काफी मुश्किल जाता था. कई कठिनाई आती थी. न्यायालय में वकील साहब की फीस देने के लिए नहीं रहती थी. अपने दोस्तों से उधार लेकर भरता था. उन्हीं की मदद के कारण आज मैं यहां तक पहुंचा हूं. अभी मैं फिलहाल में कृषि उपज मंडी में सहायक निरीक्षक के पद पर पदस्थ हूं. मैंने 8 साल तक के न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है वहां से मुझे न्याय मिला है और मेरे साथ-साथ करीब 50 से अधिक कर्मचारियों का भी फायदा हुआ है. आज के युवा यदि आपके जीवन में कुछ परेशानी या कठिनाई आए तो आप हिम्मत नहीं हारें. आपको सफलता जरूर मिलेगी.
बच्चों की करते हैं मदद
संतोष सिंह दीक्षित बताते हैं कि मेरे माता-पिता प्रोफेसर थे. वह रिटायर हो गए हैं. मुझे उनसे ही पढ़ाई लिखाई की प्रेरणा मिली थी और मैं अब ऐसे निर्धन गरीब और बेसहारा लोगों की पढ़ाई के लिए मदद करता हूं. जिनके माता-पिता नहीं हैं. मैं अपने घर खर्च की राशि बचाकर उनको कॉपी किताब और उनकी स्कूल की फीस भरने का काम करता हूं. मेरे द्वारा अभी तक 10 से अधिक बच्चों को मदद की जा चुकी है.