6 भारतीय क्रिकेटर, जिन्होंने क्रिकेट से संन्यास के बाद सियासत के मैदान पर खेली दूसरी पारी

6 भारतीय क्रिकेटर, जिन्होंने क्रिकेट से संन्यास के बाद सियासत के मैदान पर खेली दूसरी पारी


नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट के मैदान पर जब कोई खिलाड़ी बल्ला या गेंद थामता है, तो वह करोड़ों लोगों की उम्मीदों का केंद्र बन जाता है. लेकिन खेल के मैदान पर अपनी पारियां खत्म करने के बाद, कई दिग्गजों ने देश की सेवा के लिए एक नई पिच चुनी जो राजनीति की पिच थी. भारतीय प्रशंसकों के लिए ये खिलाड़ी सिर्फ एथलीट नहीं, बल्कि आइडल हैं. यही कारण है कि राजनीति में उनका डेब्यू हमेशा चर्चा का विषय रहता है. मैदान पर ‘सिक्सर किंग’और कमेंट्री बॉक्स में अपनी ‘सिद्धू-वाणी’ के लिए मशहूर नवजोत सिंह सिद्धू का राजनीतिक सफर उनके क्रिकेट करियर की तरह ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 1999 में क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद उन्होंने 2004 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा.

नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) अमृतसर से लोकसभा सांसद चुने गए और कई बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. हालांकि 2017 में उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक यू-टर्न लिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में शामिल हो गए. पंजाब सरकार में उन्होंने स्थानीय निकाय, पर्यटन और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. सिद्धू की शख्सियत जितनी रंगीन मैदान पर थी, उतनी ही बेबाक और चर्चा में रहने वाली राजनीति में भी रही है.

गौतम गंभीर जहां राजनीति की पिच पर सफल रहे वहीं मोहम्मद कैफ फ्लॉप साबित हुए,

मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी के बाद संसद का सफर
अपनी कलाइयों के जादू से दुनिया भर के गेंदबाजों को परेशान करने वाले पूर्व भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन का राजनीतिक प्रवेश काफी चर्चा में रहा. मैच फिक्सिंग के आरोपों और लंबे कानूनी संघर्ष के बाद (जिसमें बाद में अदालत ने उन्हें क्लीन चिट दी), अजहर ने अपनी नई पारी की शुरुआत की. 2009 के आम चुनाव से ठीक पहले वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद सीट से चुनाव लड़कर संसद पहुंचे. मैदान पर भारत को कई ऐतिहासिक जीत दिलाने वाले अजहर के लिए राजनीति एक ऐसा अध्याय था, जहां उन्होंने समाज सेवा के जरिए अपनी नई पहचान बनाने की कोशिश की.

कीर्ति आजाद का वर्ल्ड कप विजेता से पश्चिम बंगाल की राजनीति तक
1983 की विश्व कप विजेता टीम के सदस्य और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद का राजनीतिक डीएनए काफी मजबूत रहा है. उन्होंने भाजपा के टिकट पर बिहार के दरभंगा से सांसद बनकर अपने सफर की शुरुआत की. इससे पहले वह दिल्ली के गोल मार्केट से विधायक भी रह चुके थे. आजाद का राजनीतिक सफर काफी नाटकीय रहा है. 2015 में डीडीसीए में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर अपनी ही पार्टी के तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली की आलोचना करने के कारण उन्हें भाजपा से निलंबित कर दिया गया. 2019 में वह कांग्रेस में शामिल हुए, लेकिन धनबाद से चुनाव हार गए. इसके बाद 2021 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का हाथ थामा. 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने पश्चिम बंगाल की बर्धमान-दुर्गापुर सीट से शानदार जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को एक बार फिर साबित किया.

दिल्ली की राजनीति के ‘ओपनर’ गौतम गंभीर
भारत के दो विश्व कप (2007 और 2011) के हीरो रहे गौतम गंभीर ने 2018 में क्रिकेट से संन्यास के तुरंत बाद राजनीति में कदम रखा. 2019 में वह भाजपा में शामिल हुए और पूर्वी दिल्ली सीट से भारी मतों से चुनाव जीता. उन्होंने कांग्रेस के अरविंद सिंह लवली और आप की आतिशी जैसे दिग्गजों को करारी शिकस्त दी. सांसद के रूप में गंभीर ने खेल विकास, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जोर दिया. हालांकि, 2024 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर सबको चौंका दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह अब अपना पूरा ध्यान क्रिकेट प्रतिबद्धताओं (कोचिंग और मेंटरशिप) पर देना चाहते हैं.

गावस्कर के जोड़ीदार बनने से लेकर कैबिनेट मंत्री रहे चेतन चौहान
70 के दशक में सुनील गावस्कर के भरोसेमंद सलामी जोड़ीदार रहे चेतन चौहान ने खेल के बाद राजनीति में बहुत ही सधा हुआ सफर तय किया. उन्होंने भाजपा का दामन थामा और उत्तर प्रदेश से दो बार लोकसभा के लिए चुने गए. चौहान केवल सांसद ही नहीं रहे, बल्कि उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में युवा और खेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहकर प्रदेश के खेल ढांचे को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई. बतौर ओपनर उन्होंने जो धैर्य मैदान पर दिखाया, वही शालीनता और अडिगता उनके राजनीतिक जीवन में भी नजर आई.

कैफ राजनीति की पिच पर हुए क्लीन बोल्ड
मोहम्मद कैफ की राजनीतिक पारी को अगर क्रिकेट की भाषा में समझें, तो यह उनके लिए एक ‘खराब डेब्यू’ साबित हुई.मैदान पर अपनी शानदार फील्डिंग के लिए मशहूर कैफ राजनीति की पिच पर अपनी पकड़ नहीं बना पाए. कैफ ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था.उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर उत्तर प्रदेश की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ा.

कैफ को भाजपा के केशव प्रसाद मौर्य ने करारी शिकस्त दी. मौर्य को जहां 5 लाख से ज्यादा वोट मिले, वहीं कैफ को मात्र 58,127 वोट (लगभग 6 प्रतिशत) ही मिल सके. इस हार के बाद कैफ ने राजनीति से दूरी बना ली. उन्होंने दोबारा किसी बड़े चुनाव में हाथ नहीं आजमाया और अपना पूरा ध्यान क्रिकेट कोचिंग, कमेंट्री और मेंटरशिप पर लगा दिया.



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