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Chandi Mata Temple Satna News: कई बार मानसिक रूप से असंतुलित लोग यहां जंजीरों से बांधकर लाए जाते थे और माता चंडी के आशीर्वाद से वे पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटते थे.
सतना. मध्य प्रदेश के सतना शहर से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाद गांव का चंडी माता मंदिर आस्था और रहस्य का एक अनोखा केंद्र बना हुआ है. करीब साढ़े 6 एकड़ में फैला यह मंदिर न सिर्फ स्थानीय लोगों बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का बड़ा केंद्र है. यहां हर दिन भक्तों की भीड़ उमड़ती है. माता के दरबार में भक्त अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है और यही वजह है कि इस मंदिर की पहचान चमत्कारी स्थल के रूप में भी की जाती है. मंदिर के इतिहास को लेकर कोई सटीक वर्ष सामने नहीं आता लेकिन स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान लगभग 700 साल पुराना माना जाता है. लोकल 18 से बातचीत में पिछले 26 वर्षों से मंदिर में सेवा दे रहे वरिष्ठ पुजारी उदयभान सिंह बताते हैं कि चंडी माता की स्थापना किसी इंसान द्वारा नहीं की गई बल्कि वह यहां स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं. समय के साथ माता की मूर्ति के आसपास मंदिर का विस्तार होता गया और आज यह एक विशाल धार्मिक परिसर का रूप ले चुका है.
उन्होंने बताया कि जब भाद गांव अस्तित्व में भी नहीं था, तब बघेलवंश के लोग बरदाडी और बवनगामा क्षेत्र से यहां आए और उन्हें इस स्थान पर देवी की उपस्थिति का आभास हुआ. तभी से यह स्थान आस्था का केंद्र बन गया और पीढ़ियों से बघेल वंश ही इस मंदिर की देखरेख करता आ रहा है.
बलि और त्याग की अनोखी परंपरा
चंडी माता मंदिर के इतिहास में कई ऐसे किस्से जुड़े हैं, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाते हैं. प्राचीन समय में यहां बलि देने की परंपरा प्रचलित थी. कई श्रद्धालुओं ने अपनी मन्नत पूरी होने पर अपनी जीभ तक अर्पित कर दी. सबसे चर्चित कथा खडौरा के दर्शन सिंह बघेल की है, जिन्होंने अपनी श्रद्धा के चलते अपना सिर काटकर माता के चरणों में समर्पित कर दिया था. कहा जाता है कि उनकी तलवार आज भी खडौरा गांव में उनके वंशजों के पास सुरक्षित है और उस तलवार को सामने रखकर माता की पूजा भी की जाती है. पुजारी ने कहा कि ऐसी कई कहानियां आज भी लोगों के बीच श्रद्धा और आस्था का प्रतीक बनी हुई हैं.
मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियां
चंडी माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान ही नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक आयोजनों का भी केंद्र है. यहां नियमित रूप से भंडारा, मुंडन संस्कार, सामूहिक विवाह, यज्ञ, भागवत कथा, रामकथा और शिवपुराण जैसे कई धार्मिक आयोजन होते रहते हैं. मंदिर परिसर में चंडी माता के अलावा भगवान शिव और बजरंगबली के मंदिर भी स्थित हैं. पुजारी उदयभान सिंह ने बताया कि मंदिर के सामने स्थित शिव मंदिर में भी भोलेनाथ को स्वयंभू माना जाता है, जो इस पूरे परिसर को और अधिक आध्यात्मिक बनाता है. यहां पुराने समय में खुदाई या तालाबों से प्राप्त कई प्राचीन मूर्तियां भी सुरक्षित रखी गई हैं.
चमत्कारों की कहानियां बढ़ाती विश्वास
स्थानीय निवासी जगेंद्र सिंह लोकल 18 को बताते हैं कि वह बचपन से इस मंदिर में आ रहे हैं और उन्होंने यहां कई चमत्कार अपनी आंखों से देखे हैं. पहले यह मंदिर काफी छोटा हुआ करता था लेकिन समय के साथ श्रद्धालुओं के सहयोग से इसका विस्तार हुआ और करीब 18 साल पहले इसे भव्य स्वरूप मिला. उन्होंने एक दिलचस्प घटना का जिक्र करते हुए बताया कि कई बार मानसिक रूप से असंतुलित लोग यहां जंजीरों से बांधकर लाए जाते थे और माता के आशीर्वाद से वे पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटते थे. इसके अलावा संतान प्राप्ति, गंभीर बीमारियों से राहत और भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए भी लोग यहां पहुंचते हैं. जगेंद्र सिंह ने बताया कि साल 1868 में जब बघेल समुदाय को भाद और बवनगवां क्षेत्र रीवा रियासत द्वारा दिया गया, तब से लेकर आज तक मंदिर की व्यवस्था बघेलवंश के हाथों में है. दिगेश सिंह बघेल उस दौरान ग्राम भाद के मालिक थे और तब महराज सिंह इलाकेदार हुआ करते थे. यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था, त्याग और विश्वास की जीवंत मिसाल है, जहां हर दिन किसी न किसी की उम्मीदें पूरी होने की कहानियां जन्म लेती हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.