मैनुअल या ऑटोमैटिक, ऑफिस आने-जाने के लिए कौन सी कार बेस्ट? एक साल के कैलकुलेशन से समझें

मैनुअल या ऑटोमैटिक, ऑफिस आने-जाने के लिए कौन सी कार बेस्ट? एक साल के कैलकुलेशन से समझें


Manual vs Automatic Car: दिल्ली-एनसीआर जैसी जगह रोजाना ऑफिस आने-जाने में 2-3 घंटे ट्रैफिक जाम में फंसना आम बात है. ऐसे में नई कार खरीदते वक्त सबसे बड़ा सवाल यही उठता है- मैनुअल गियर वाली कार लें या ऑटोमैटिक? मार्केट में AMT, CVT और DCT जैसी मॉडर्न ऑटोमैटिक तकनीक ने शहर की सड़कों पर ड्राइविंग को बिल्कुल आसान बना दिया है.

हालांकि, कीमत का फर्क, माइलेज, मेंटेनेंस और लंबे समय का खर्च भी देखना जरूरी है. क्या ₹1 लाख ज्यादा खर्च करके ऑटोमैटिक लेना वाकई फायदेमंद है? या फिर ऑल टाइम फेवरेट मैनुअल ट्रांसमिशन के साथ ही गाड़ी खरीदना ज्यादा फायदे का सौदा रहेगा. अपने इस लेख में हम यही जानने की कोशिश करेंगे.

कीमत का अंतर

मैनुअल वेरिएंट से ऑटोमैटिक वैरिएंट औसतन ₹80,000 से ₹1,00,000 तक महंगा पड़ता है. ऐसे में हम ऑटोमौटिक को मैनुअल के मुकाबले एवरेज 1 लाख रुपये ज्यादा महंगा मान लेते हैं. फिलहाल दिल्ली में पेट्रोल की कीमत ₹94.77 प्रति लीटर है.

रियल-वर्ल्ड माइलेज

दिल्ली-एनसीआर जैसे ट्रैफिक में एक से लेकर 1.2 लीटर इंजन वाली पेट्रोल गाड़ियां मैनुअल में 16 kmpl और ऑटोमैटिक में 14 kmpl तक का माइलेज देने में सक्षम होती हैं. हम मान रहे हैं कि आप साल भर में 250 दिन ऑफिस जाते हैं और आप डेली 40 किमी तक गाड़ी चलाते हैं. ऐसे में कैलकुलेशन कुछ इस तरह होगा-

  • वार्षिक दूरी: 40 किमी × 250 = 10,000 किमी.
  1. मैनुअल कार के फ्यूल: 10,000 ÷ 16 = 625 लीटर.
  2.  कुल खर्च: 625 × 94.77 = 59,231 रुपये.
  1. ऑटोमैटिक कार के लिए फ्यूल: 10,000 ÷ 14 = 714 लीटर.
  2. कुल खर्च: 714 × 94.77 = 67,693 रुपये.

मेंटेनेंस का खर्च

मैनुअल कार के लिए दिल्ली के ट्रैफिक में क्लच हर 40,000-50,000 किमी पर बदलना पड़ता है. इसमें 10 से 15 हजार रुपये तक खर्च होते हैं. इस तरह 5 साल में 1-2 बार बदलाव का खर्च 20-30 हजार के आस-पास हो सकता है. ऑटोमौटिक ट्रांसमिशन में क्लच का खर्च नहीं आता है, लेकिन सर्विसिंग थोड़ी महंगी (वार्षिक ₹3,000-5,000 ज्यादा) पड़ती है. इस तरह मेंटेनेंस का खर्च लगभग एक बराबर है.

असली फायदा कहां?

दिल्ली जैसे शहरों की जाम वाली सड़कों पर मैनुअल में क्लच दबाने-छोड़ने से पैर में दर्द, थकान और एक्सीडेंट का खतरा बढ़ता है. ऑटोमैटिक में सिर्फ एक्सीलेटर और ब्रेक पर ध्यान देना है. महिलाएं, सीनियर ड्राइवर और लंबे कम्यूट वाले लोग ऑटो पसंद करते हैं. रिसेल वैल्यू भी अब दोनों लगभग बराबर है, क्योंकि ऑटो की डिमांड बढ़ गई है.

हमारी सलाह: अगर आपका बजट थोड़ा बढ़ा सकते हैं और रोजाना 30-50 किमी शहर में ड्राइव करते हैं, तो ऑटोमैटिक कार बेस्ट चॉइस हो सकती है. वहीं, हाईवे ज्यादा चलते हैं तो मैनुअल पर विचार करें. फैसला आपका है. अपनी जरूरत और बजट को देखकर ही ऑटोमैटिक या मैनुअल में से किसी एक को चुनें.



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