नक्सलियों की रेड कॉरिडोर नीति सफल होती तो अमरकंटक होती राजधानी, बालाघाट SP का बड़ा खुलासा

नक्सलियों की रेड कॉरिडोर नीति सफल होती तो अमरकंटक होती राजधानी, बालाघाट SP का बड़ा खुलासा


Balaghat News: 1967 में शुरू हथियार बंद कथित संघर्ष पर विराम लगता नजर आ रहा है. बीते साल नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन के लिए अब कुछ ही दिन बचे हैं. अब माओवादियों को उंगलियों पर गिना जा सकता है. वहीं, रेड कॉरिडोर खत्म होता नजर आ रहा है. लेकिन, 13 साल पहले नक्सलियों ने एक विस्तार नीति पारित की थी. छत्तीसगढ़ से लाल गलियारे को वह बालाघाट, मंडला और डिंडौरी से आगे बढ़ाना चाहते थे. इस बात का खुलासा बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान किया. जानिए क्या थी नक्सलियों की वो प्लानिंग…

तब एमपी में होता नक्सलियों का हेडक्वार्टर
बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने लोकल 18 को बताया, काफी पहले जब नक्सलियों का एनकाउंटर हुआ, तब पुलिस को उनकी विस्तार नीति के पुख्ता सबूत मिले थे. इसमें वह मध्य प्रदेश के अमरकंटक के इलाके को अपना हेडक्वार्टर बनाना चाहते थे. इसके पीछे वजह ये थी कि छत्तीसगढ़ में फोर्स का मूवमेंट बढ़ गया था, नतीजतन वह अबूझमाड़ से शिफ्ट कर एमपी के जंगलों में आना चाहते थे. नक्सली अपने हर पांच साल और दस साल के लिए प्लानिंग करते थे.

कब तैयार हुई थी विस्तार नीति?
विस्तार नीति का प्रस्ताव साल 2013 में नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी ने पास किया था. इसके पीछे उनकी वजह थी लिबेरेटिड जोन को मजबूत करना. इसमें नक्सली चाहते थे कि छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य को एमपी और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों तक जोड़ना. इसमें बालाघाट, मंडला, डिंडोरी और अचानकमार क्षेत्र तक विस्तार करना था.

इसलिए अमरकंटक को चाहते थे राजधानी
जिस अमरकंटक के इलाके को नक्सली अपनी राजधानी बनाना चाहते थे, उसमें उनकी कनेक्टिविटी गढ़चिरौली से 454 किलोमीटर, बस्तर से 584 किलोमीटर, झारखंड के पलामू से 403 किलोमीटर, बिहार के नवादा से 610 किलोमीटर और यूपी के सोनभद्र 400 किलोमीटर थी. ऐसे में अमरकंटक भी घने जंगल और पहाड़ वाला इलाका है. शायद यही वजह रही होगी कि नक्सलियों ने अमरकंटक को अपनी राजधानी के लिए चुना.

दो साल तक हुआ सर्वे
विस्तार नीति पारित होने के बाद नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी के मेंबरान देवजी सोनू उर्फ भूपति और दीपक तेलतुमड़े प्लानिंग में शामिल थे. साल 2015 से 2017 की बीच बड़ी संख्या में माओवादी इन इलाकों में सक्रिय हुए. इस दौरान ये नक्सली इलाके की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति को जांचते और परखते थे. इसी आधार पर नक्सलियों ने प्लान को ग्राउंड पर लागू करने की योजना बनाई.

साल 2017 में बना था एमएमसी जोन
नक्सलियों ने एमएमसी जोन यानी मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का गठन साल 2017 में हुआ था. इससे पहले ही कान्हा भोरमदेव डिविजन का गठन हुआ. एमएमसी जोन का गठन सेंट्रल कमेटी मेंबर दीपक तेलतुमडे, स्पेशल जोनल कमेटी मेंबर दामा, एसजेडसीएम सुरेंद्र उर्फ कबीर के नेतृत्व में किया गया. उस समय एमएमसी जोन का सचिव दीपक तेलतुमड़े के बनाया गया. एमएमसी जोन में दो डिवीजन हुआ करते थे. इसमें कान्हा भोरमदेव यानी केबी डिवीजन और दूसरा जीआरबी डिविजन (गोंदिया राजनांदगांव बालाघाट डिवीजन) जीआरबी में तीन दलम थे, जिसमें दर्रेकसा, टांडा और मलाजखंड दलम शामिल थे. वहीं, कान्हा भोरमदेव डिवीजन में विस्तार -2, भोरमदेव एरिया कमेटी और विस्तार प्लाटून-3 कमेटी थी. बताया जाता है कि इस दौरान एमएमसी जोन में 140 से 150 नक्सली थे.

क्यों फेल हुई नक्सलियों की विस्तार नीति?
साल 2017 में बना एमएमसी जोन का प्रभारी बड़ा दीपक उर्फ मिलिंद तेलतुमड़े के हाथों में थी, लेकिन बढ़ते एंटी नक्सल ऑपरेशन बढ़ते गए. ऐसे में वह एमएमसी जोन से निकलकर गढ़चिरौली निकल गया. नवंबर 2021 में वह महाराष्ट्र की सी-60 फोर्स की गोलियों का निशाना बना और मारा गया. इसके बाद से ही संगठन कमजोर पड़ने लगा. वहीं, एमएमसी जोन के प्रभारी बनने को लेकर संगठन में दरार भी आ गई. ऐसे में नेतृत्वविहीन होता संगठन ही विस्तार नीति के फेल होने का कारण बनी.



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