सरकारी नौकरी में दो बच्चों की पाबंदी की शर्त अब हटने जा रही है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इसका प्रस्ताव तैयार कर लिया है और इसे जल्द ही कैबिनेट में लाया जाएगा। इस शर्त के हटने के बाद यदि नौकरी कर रहे किसी अधिकारी या कर्मचारी का तीसरा बच्चा भी हुआ तो उन्हें नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकेगा। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। बता दें कि 24 साल पहले साल 2001 में प्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 में संशोधन करते हुए यह प्रतिबंध लागू किया था। अब नियम में बदलाव क्यों किया जा रहा है? इससे कौन से विभागों के कर्मचारियों को राहत मिलेगी और जो मामले कानूनी रूप से उलझे हैं उनका क्या होगा? पढ़िए रिपोर्ट क्या है 24 साल पुराना नियम जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने यह नीतिगत फैसला लिया था। 26 जनवरी 2001 के बाद जिस भी सरकारी कर्मचारी के घर तीसरी संतान का जन्म होगा, उसे सेवा के लिए अयोग्य माना जाएगा। यह नियम न केवल नई भर्तियों पर लागू है, बल्कि पहले से सेवारत कर्मचारियों पर भी समान रूप से प्रभावी है। क्यों किया जा रहा नियम में बदलाव? पिछले कुछ सालों में इस नियम की प्रासंगिकता पर लगातार सवाल उठ रहे थे। इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और एक दंडात्मक कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा था। हाल ही में बदलाव की इस प्रक्रिया में तब और तेजी आई जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हिंदू परिवारों में कम से कम तीन बच्चे होने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी साल 18 फरवरी को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान, सरसंघचालक मोहन भागवत ने घटती हिंदू जनसंख्या पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जिस समाज में परिवार में तीन बच्चे नहीं होते, वो भविष्य में समाप्त हो जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक तर्कों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्रजनन दर 2.1 है यानी जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए औसतन तीन बच्चे आवश्यक हैं। इससे ज्यादा बच्चे भी संसाधनों पर दबाव डालते हैं, लेकिन तीन बच्चों का होना एक स्वस्थ समाज के भविष्य के लिए जरूरी है। 4 पॉइंट्स में समझिए फैसले का असर
लंबित मामलों पर कैबिनेट लेगी फैसला: विभिन्न न्यायालयों में और विभागीय स्तर पर तीसरी संतान से जुड़े जितने भी मामले लंबित हैं, उनपर कैबिनेट में फैसला होगा। कर्मचारियों को अब कानूनी लड़ाई और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलेगी। बर्खास्तगी का डर खत्म: जो कर्मचारी इस नियम के कारण बर्खास्तगी के कगार पर थे, उनकी नौकरी अब सुरक्षित हो जाएगी। नई भर्तियों में पात्रता: भविष्य में होने वाली सभी सरकारी भर्तियों में तीन संतान वाले उम्मीदवार भी आवेदन करने के लिए पात्र होंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा का दायरा और बढ़ेगा। पुराने मामलों पर कोई असर नहीं: हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2001 के बाद जिन कर्मचारियों को इस नियम के तहत नौकरी से बर्खास्त किया जा चुका है, इस पर भी फैसला कैबिनेट में लिया जाएगा। सबसे ज्यादा प्रभावित विभाग, जैसे- स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा, में इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है। अनुमान है कि इन विभागों में ही 8 से 10 हजार के बीच ऐसे मामले लंबित थे। पूर्व में इस नियम की कठोरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक न्यायाधीश को भी दो से अधिक संतान होने के कारण अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी। प्रस्ताव को मुख्यमंत्री की सैद्धांतिक सहमति मिल चुकी है। जिन कर्मचारियों की नौकरी गई है या जिनके मामले कोर्ट में लंबित हैं उनका फैसला कैबिनेट में होगा नीरज मंडलोई, प्रमुख सचिव, सीएमओ राजस्थान और छत्तीसगढ़ पहले ही हटा चुके हैं पाबंदी मध्य प्रदेश यह कदम उठाने वाला पहला राज्य नहीं है। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ और राजस्थान काफी पहले ही इस तरह की पाबंदियों को हटा चुके हैं। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने 11 मई 2016 को और छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने 14 जुलाई 2017 को इस नियम को समाप्त कर दिया था। इन राज्यों में अब तीन बच्चों वाले कर्मचारी बिना किसी कानूनी बाधा के सरकारी नौकरी कर रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर आंध्र प्रदेश जैसे राज्य ने तो एक कदम आगे बढ़कर तीसरा बच्चा पैदा करने पर 25,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश की प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा राष्ट्रीय औसत- 2.1 मध्य प्रदेश – 2.9 ग्रामीण- 2.8 , शहरी- 2.1 मायने- यहां एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन लगभग 3 बच्चों को जन्म देती है। सोर्स- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार
Source link