कभी ‘डबल कमाई’ का जरिया, आज बोझ बना पशुपालन, भेड़-सुअर पालकों की दर्दभरी कहानी

कभी ‘डबल कमाई’ का जरिया, आज बोझ बना पशुपालन, भेड़-सुअर पालकों की दर्दभरी कहानी


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कभी ‘डबल कमाई’ का जरिया, आज बोझ बना पशुपालन, भेड़-सुअर पालकों की दर्दभरी कहानी

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Animal husbandry crisis : छतरपुर जिले में सुअर और भेड़ पालन बड़े पैमाने पर किया जाता था. हालांकि, अब पशुपालकों का कहना है कि जब से सुअर और भेड़ के बाल बिकने बंद हो गए तब से पशुपालन में उनकी रुचि कम हो गई है.

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छतरपुर : जिले में सुअर और भेड़ पालन बड़े पैमाने पर किया जाता था. हालांकि, अब पशुपालकों का कहना है कि जब से सुअर और भेड़ के बाल बिकने बंद हो गए तब से पशुपालन में उनकी रुचि कम हो गई है.

उत्तरप्रदेश के फतेहपुर के रहने वाले 60 वर्षीय बाबूलाल पाल लोकल 18 बताते हैं कि उनके पास लगभग 100 भेड़ है. भेड़ पालन उनका पुस्तैनी काम है. उनके पिता और बाबा भी करते थे. इसी से उनका परिवार चलता है. ये एक तरह की उनकी किसानी है क्योंकि इसमें भी काफी फायदा होता था उनका घर-परिवार भेड़ पालन के कमाई से ही चलता है. क्योंकि पहले इसमें डबल कमाई होती थी. लेकिन अब लगभग दस सालों से उतनी कमाई नहीं हो पा रही क्योंकि भेड़ का जो बाल वह लोग काट कर बेचते थे उसकी खरीददारी बंद हो गई है.

वहीं मप्र छतरपुर के पशुपालक भरोसेराम बताते हैं कि मैं सुअर पालन करता हूं. सुअर पालन में पहले बहुत कमाई होती थी लेकिन जब से सुअरों के बाल बिकने बंद हो गए हैं तब से सुअर पालन में उतना मुनाफा नहीं हो पाता है. अब तो महिलाओं के ही बाल खरीदने लोग आते हैं. हमारे जानवरों के बाल तो कोई नहीं पूछता है. पहले सुअरों के बाल से प्लास्टिक ब्रश बनते थे. क्योंकि इन ब्रश में बाल सुअर के लगते थे. एक सुअर में 10 ग्राम से लेकर आधा किलो बाल निकल आते थे. इनके बालों की कीमत 1 हजार रुपए किलो होती थी.

साल में तीन बार काटते हैं बाल
कृपाल बताते हैं कि “भेड़ के बाल बहुत जल्दी बड़े हो जाते हैं, इसलिए साल में तीन बार भेड़ के बाल काटते हैं. कटवाने के लिए भी मेहनताना लगता है. अगर समय रहते भेड़ों के बाल नहीं काटे गये तो वह एक समय के बाद गिर जाते हैं. दूसरी बात देर से बाल काटने पर भेड़ों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है. जिस वजह से भेड़ों के बाल काटकर उनको अब फेंकना पड़ता है. यही कारण है कि भेड़ पालकों को अब उतनी कमाई नहीं होती.

एक समय पर इतना था भेड़ो के बालों का दाम
भेड़ पालकों कहना है कि एक समय था जब बाल लेने के लिए ग्राहक बड़ी संख्या में आते थे. 100 रुपये प्रति किलो की दर से बालों को खरीदते थे. अब बाल खरीदने वाले नहीं आ रहे हैं और कभी कोई खरीदने आ गया तो बाल की कीमत गिराकर बात करता है. 100 रुपये किलो की दर से बिकने वाले भेड़ों की बाल को 2 रुपये किलो का मूल्य मिल रहा है. इसलिए मजबूरन भेड़ के बालों को गढ्ढे में खोदकर फ़ेंक देते हैं.

भेड़ के बालों से बनती थी ये वस्तु
सुकुर्वा प्रसाद कहते हैं कि “भेड़ के बाल से कंबल और गर्म कपड़े बनते हैं. इस लिए कपड़ा कारोबारी, व्यापारी भेड़ के बालों को एक समय था जब वह उनके घर में भेड़ के बाल को खरीद कर ले जाते थे? लेकिन अब दासियों साल हो रही है उनके भेड़ के उन कि बिक्री नहीं हो रही है.”

बहुत ही गर्म होता है भेड़ का बाल
आगे बताते हैं कि “भेड़ का बाल बहुत ही गर्म होता है. इसलिए भेड़ के बाल ठंड सीजन में नहीं काटते हैं. इसे होली के समय और बरसात के समय काटते हैं. साल में 3 बार बाल काटते हैं.भेड़ पालकों को भेड़ पालने में भी रुचि होती थी, लेकिन जब से बालों की खरीदा बंद हुई. तब से भेड़ पालने के रुचि भी खत्म हो रही है, क्योंकि भेड़ पालन बहुत ही मेहनत का काम है. भेड़ों को बारिश के अलावा अन्य सीजन में बांध नहीं सकते क्योंकि उनके अंदर बहुत गर्मी होती है. इस लिए जंगल-जंगल घुमाना पड़ता है और खुद भी परिवार से दूर रहना पड़ता है.”

भेड़ और सुअर पालन और उनके बालों से बने उनका काम अब कम होता दिख रहा है. सरकार भी बालों की खरीद पर रोक लगा रही है. सरकार से पशुपालकों की मांग है कि उनकी जीविका का एक यही रास्ता था अब वो भी बंद हो गया है तो और वो क्या करें.

About the Author

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें



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