शोषण के खिलाफ लड़ने वाला नक्सली बेगुनाहों की हत्या पर चुप क्यों? पढ़ें इस कमांडर की कहानी

शोषण के खिलाफ लड़ने वाला नक्सली बेगुनाहों की हत्या पर चुप क्यों? पढ़ें इस कमांडर की कहानी


Balaghat News: बालाघाट के एक बड़े इलाके में माओवादियों का चार दशकों तक कहर रहा है. लेकिन, बीते एक साल में सुरक्षाबलों के प्रभावी ऑपरेशन्स की बदौलत न सिर्फ 10 नक्सली मारे गए, बल्कि एमएमसी जोन (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़) में 42 नक्सलियों को सरेंडर होने पर मजबूर होना पड़ा. वहीं, बालाघाट जिले में 13 नक्सली सरेंडर हुए. फिलहाल, सभी पुलिस की निगरानी में हैं. साथ ही, छोटे कैडर के नक्सलियों को कपड़ा सिलाई और जेसीबी चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है.

लेकिन, तीन बड़े नक्सलियों को अलग रखा गया है. इन पर सतत निगरानी है. इन्हीं में से एक है दीपक उर्फ सुधाकर उइके. वह बालाघाट जिले के पालाघाोंदी का रहने वाला है. वह इकलौता बालाघाट मूल का नक्सली है, जो संगठन में डीवीसीएम पद तक पहुंचा, यानी वह बालाघाट मूल का सबसे बड़ा नक्सली कमांडर बना. बालाघाट के नक्सल इतिहास में सरेंडर करने वाला वह आखिरी नक्सली है. ऐसे में पुलिस के पहरे के बीच लोकल 18 ने उससे मुलाकात की और जाना कि कौन से हालात थे, जिसने उसे नक्सली बनने पर मजबूर किया.

शर्तों के साथ मिली मिलने की अनुमति
लोकल 18 रिपोर्टर को कुछ शर्तों के साथ नक्सलियों से मिलने की अनुमति दी गई, जिसमें पहली शर्त थी कि इस मुलाकात का वीडियो नहीं बनेगा. ऐसे में रिपोर्टर ने पेन-डायरी लेकर पुलिस पहरे के बीच बातचीत शुरू की. सवाल कई थे और समय कम ऐसे में लोकल 18 रिपोर्टर ने केबी डीविजन प्रमुख कबीर उर्फ सुरेंद्र, राकेश होड़ी और दीपक से बातचीत की. सबसे पहले जानिए बालाघाट मूल के सबसे बड़े नक्सली कमांडर दीपक उर्फ सुधाकर उइके की कहानी, जो बताती है कि आखिर किस तरह नक्सलियों ने बालाघाट में पैठ जमाई? कैसे आदिवासी और मजदूरों के अधिकारों के आंदोलनों को आधार बनाकर स्थानीय लोगों जोड़ा?

पढ़ना चाहता था पर मामा ने पढ़ने नहीं दिया…
लोकल 18 रिपोर्टर को दीपक उर्फ सुधाकर ने बताया, ”बचपन में वह अपने मामा के गांव पोलपटपरी में रहकर पढ़ाई करता था. शुरुआत में वह पढ़ाई तो करना चाहता था, लेकिन मामा के तानों ने पढ़ाई भी छुड़वा दी. ऐसे में जब मैं 5वीं कक्षा की परीक्षा देकर घर लौटा तो मामा ने बोझ होने का ताना देकर खुब खरी-खोटी सुनाई. तंग आकर मैंने अपने कपड़े झोले में भरे और अपने गांव पालाघोंदी पहुंचा. महज 12 साल की उम्र में ही शादी हो गई. पत्नी मायके में ही रही. साल 1991 के दौरान गांव में नक्सली मूवमेंट तेज हो गया था. मैं भी उनके संपर्क में आया. गांव में नक्सलियों की मीटिंग होती तो देखने जाना था. वही जिज्ञासा नक्सल संगठनों की तरफ खींचने लगी”.

तब पहली बार फोर्स की नजर में आया…
आगे बताया, 1994 में मेरी उम्र 20 साल थी. तब नक्सलियों की मीटिंग में शामिल होने लगा था. उनके बनाए स्थानीय संगठन से जुड़ गया. लेकिन, वह नक्सल संगठन नहीं था. उस संगठन का नाम DKAMS था यानी दंडकारण्य किसान आदिवासी मजदूर संगठन. संगठन से जुड़ने के बाद गांवों में पोस्टर और पर्चे बांटना और लोगों को अधिकारों के लिए इकट्ठा होने के लिए प्रेरित करने का काम था. बाद में मैं संगठन का अध्यक्ष भी बना. तब फोर्स (सुरक्षाबलों) की नजर में आ गया.

तब नक्सली बना, मुठभेड़ में पत्नी मारी गई
छोटा दीपक के अनुसार, जब DKAMS का अध्यक्ष था, तब सक्रियता को देख पुलिस अक्सर मुझे उठा लेती थी. एक बार इसी संगठन के कुल्पा गांव के रहने वाले 35 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया और जमकर पिटाई की. इस दौरान एक की मौत हो गई. इसके बाद मेरा झुकाव नक्सली विचारधारा की तरफ होने लगा. प्रशासन से नफरत सी हो गई. एक दिन माटे गांव में मुझे, हिरालाल और जान सिंह को पुलिस ने सुबह खेत से हिरासत में ले लिया. इस दौरान पुलिस ने बहुत पिटाई की. वहां से छूटने के बाद मैं पत्नी के साथ सीधे जंगल की ओर चला गया. 1998 से लेकर 12 दिसंबर 2026 तक जंगल की जिंदगी जी. हालांकि, पत्नी जमुना बाई उइके साल 2019 में मुठभेड़ के दौरान मारी गई.

ऐसी रही नक्सली दीपक की शुरुआत
नक्सली दीपक शुरुआत में सिर्फ एक कमेटी मेंबर के तौर पर संगठन में शामिल हुआ था. सबसे पहले वह साल 1996 में परसवाड़ा दलम में शामिल हुआ. इसके बाद बालाघाट और छत्तीसगढ़ के जंगलों में कमांडर भगत मड़ावी से ट्रेनिंग ली. इस समय नक्सली कमांडर सूरज टेकाम ने मलाजखंड एरिया कमेटी का गठन किया, जिसमें महज 7 सदस्य थे. वह सबसे ज्यादा मलाजखंड एरिया कमेटी में सक्रिय रहा. फिर महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के कोरची चला गया. उस दौरान नक्सली सुजाता के नेतृत्व में काम किया. साल 2003 में वापस भेज दिया गया. फिर से वह दर्रेकसा दलम में शामिल हो गया.

पत्नी और बेटा भी बना नक्सली
दीपक की दो पत्नियां थी, जिसमें पहला बाल विवाह जमुना के साथ हुआ तो दूसरी कला बाई. लेकिन, शादी के दो साल में ही वह उसे छोड़कर चली गई. इससे उन्हें दो लड़के हुए. इसमें उसका बड़ा बेटा संतोष साल 2007 में नक्सली बना, लेकिन संगठन में रहते हुए ही भारती नाम की लड़की से प्यार हो गया. इसके बाद वह संगठन छोड़कर भाग गए. फिर पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया. आखिर में दोनों जेल से छूटे और उन्होंने शादी कर ली.

एसीएम से बना डीवीसीएम फिर सरेंडर
छोटा दीपक एसीएम यानी एरिया कमेटी मेंबर के पद पर संगठन में शुरुआत की. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और नक्सल संगठन कमजोर पड़ने लगे. दीपक पर जिम्मेदारियां आने लगीं. साल 2021 में तब उसे डीवीसीएम डिविजल कमेटी मेंबर बनाया गया. तब दीपक को पहली बार टैबलेट मिला. वहीं, संगठन में लेवी के पैसों को संभालने और बांटने की भी जिम्मेदारी मिली. आखिर में जो 11 लाख 67 हजार रुपए मिले, उसे दीपक ने छिपाया था. ऐसे में उसे नक्सलियों का खजानची भी कहते हैं. वहीं, नक्सल संगठन में इस डीवीसीएम पद तक पहुंचने वाला वह एकमात्र बालाघाट मूल का नक्सली है. आखिरी में वह कई दिनों तक भटकता रहा. फिर 12 दिसंबर 2025 को एसीएम रोहित के साथ सरेंडर करने वाला जिले का आखिरी नक्सली बन गया. लोकल 18 ने जब उससे पूछा कि यहां से छूटकर क्या करोगे? तब कहा, ‘अब जनता की लड़ाई लड़ूंगा, लेकिन संविधान के रास्ते पर चल कर.”

इस सवाल पर चुप रहा दीपक
लोकल 18 ने उससे पूछा आपके गांव के पास तो माइनिंग हो रही है, इसे कैसे देखते हैं? तब वह रूककर कहता है कि हम कभी माइनिंग का विरोध नहीं करते. बस नियमों से होनी चाहिए और जनता को जितनी जरूरत है उतनी है. लेकिन वो नियमों को ताक पर रखकर खनन करते हैं. वहीं, माओवादी विचाराधारा के सवाल पर कहा, ‘संगठन समाज सुधारने के लिए है. जैसे दारूबंदी, सामाजिक न्याय, मजदूर किसान के अधिकार, शोषण के खिलाफ समतामूलक समाज बनाने की लड़ाई लड़ता है”. लेकिन, निर्दोषों की हत्या के सवाल पर दीपक खामोश रह गया.



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