राजधानी भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) में ‘आंतरिक सीधी भर्ती’ को लेकर विवाद अब खुलकर सड़क पर आ गया है। मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के आह्वान पर डॉक्टरों ने न सिर्फ इस भर्ती प्रक्रिया का सामूहिक बहिष्कार किया, बल्कि लगातार दूसरे दिन एक घंटे का ‘पेन डाउन’ आंदोलन कर डीन कार्यालय के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। “डीन होश में आओ” जैसे नारों के बीच डॉक्टरों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि विवादित आदेश तत्काल वापस नहीं लिया गया तो आने वाले दिनों में ओपीडी सहित सभी सेवाएं ठप कर दी जाएंगी। डॉक्टरों का कहना है कि जब कोई उम्मीदवार ही इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहा, तो यह विज्ञप्ति अपने आप ही निरस्त मानी जानी चाहिए। सीधी भर्ती के खिलाफ एकजुट हुए डॉक्टर गांधी मेडिकल कॉलेज में 25 मार्च को डीन कार्यालय द्वारा पदोन्नति के पदों पर ‘आंतरिक सीधी भर्ती’ का विज्ञापन जारी किया गया था। इसी के विरोध में मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन ने मोर्चा खोल दिया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीया का कहना है कि यह भर्ती प्रक्रिया सीनियर डॉक्टरों के अधिकारों के खिलाफ है। इससे उनकी वर्षों की वरिष्ठता और उससे जुड़े वित्तीय लाभ खत्म हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई मेडिकल कॉलेजों में इस तरह की भर्ती का विरोध हो रहा है। हाल ही में ग्वालियर हाईकोर्ट ने भी इसी तरह की भर्ती प्रक्रिया को निरस्त किया है, जिससे डॉक्टरों के पक्ष को मजबूती मिली है। दूसरे दिन भी पेन डाउन आंदोलन गुरुवार को लगातार दूसरे दिन दोपहर 12 से 1 बजे तक ‘पेन डाउन’ आंदोलन किया गया। इस दौरान हमीदिया अस्पताल के ब्लॉक 2 में बड़ी संख्या में डॉक्टर एकत्र हुए और भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाई। आंदोलन में विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक और मेडिकल ऑफिसर तक शामिल रहे, जिससे विरोध की व्यापकता साफ नजर आई। सीधी भर्ती से खत्म हो जाएगी सेवा निरंतरता नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. हिमांशु शर्मा ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह अवैधानिक है। उन्होंने बताया कि सीधी भर्ती से सीनियर डॉक्टरों की सेवा निरंतरता (Continuation of Service) टूट जाती है।
“जिस संस्थान में डॉक्टर 15-20 साल से काम कर रहे हैं, वहां उन्हें नए उम्मीदवार की तरह ट्रीट किया जाएगा। इससे ग्रेच्युटी, वेतन वृद्धि, एनपीएस और पेंशन जैसे लाभ प्रभावित होंगे,” उन्होंने कहा। 15 साल का अनुभव भी नहीं होगा मान्य हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल वर्मा ने बताया कि वे 15 साल से एसोसिएट प्रोफेसर हैं, लेकिन अब प्रोफेसर पद के लिए उन्हें अपने जूनियर्स के साथ प्रतियोगिता करनी होगी।
उन्होंने कहा, “यदि चयन हो भी जाता है, तो नई नियुक्ति मानी जाएगी। इससे मेरा पूरा अनुभव और सेवा रिकॉर्ड बेकार हो जाएगा। साथ ही एक साल का प्रोबेशन पीरियड भी लागू होगा।” डीन का जवाब: उच्च स्तर से मार्गदर्शन का इंतजार स्त्री रोग विभाग की एचओडी डॉ. शबाना सुलताना ने बताया कि इस मामले में डीन से चर्चा की गई है। डीन ने कहा है कि वे उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन लेने के बाद ही आगे कोई निर्णय लेंगी। डॉक्टरों ने अपने विरोध को मजबूत करने के लिए न्यायालय के फैसलों का भी हवाला दिया है। ग्वालियर, जबलपुर और इंदौर हाईकोर्ट बेंच ने पूर्व में इस तरह की भर्ती प्रक्रिया को खारिज किया है। हाल ही में डॉ. आशीष कौशल बनाम मध्यप्रदेश शासन मामले में भी ग्वालियर हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती को निरस्त किया, जिससे डॉक्टरों का पक्ष और मजबूत हुआ है। सरकार तक पहुंचा मामला, उच्चस्तरीय बैठक इस विवाद को लेकर प्रोग्रेसिव मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन (PMTA) के प्रतिनिधिमंडल ने उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला, एसीएस स्वास्थ्य अशोक वर्णवाल और आयुक्त स्वास्थ्य से मुलाकात कर चुके हैं। बैठक में डॉक्टरों ने स्पष्ट कहा कि पदोन्नति के पद केवल डीपीसी (DPC) के माध्यम से ही भरे जाने चाहिए। PMTA ने इस दौरान चिकित्सा शिक्षकों से जुड़े 10 अन्य लंबित मुद्दों का भी जिक्र किया। इन मुद्दों का समाधान पिछले दो वर्षों से नहीं हो पाया है, जिससे डॉक्टरों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। संघ ने संचालनालय और शासन स्तर के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कार्रवाई की मांग की है। 21 अप्रैल से प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी PMTA की कार्यकारिणी बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो 21 अप्रैल से प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। डॉ. अविनाश ठाकुर ने चेतावनी दी कि यदि सीधी भर्ती का आदेश वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन को क्रमिक रूप से तेज किया जाएगा। डॉ. राकेश मालवीया ने कहा कि हम अपने अनुभव और वरिष्ठता के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे। अगर विज्ञप्ति वापस नहीं ली गई, तो ओपीडी से लेकर सभी सेवाओं का बहिष्कार करेंगे। जीएमसी में शुरू हुआ यह विवाद अब सिर्फ एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह “नीति बनाम अधिकार” की लड़ाई बनता जा रहा है, जहां एक तरफ प्रशासनिक फैसले हैं, तो दूसरी ओर वर्षों से सेवा दे रहे डॉक्टरों के अधिकार और भविष्य दांव पर हैं।
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