Due to misinterpretation of the order of the then Collector, thousands of farmers are sorrowed to snatch the land of their forefathers. | तत्कालीन कलेक्टर के आदेश की गलत व्याख्या करने से हजारों किसानों को अपने पुरखों की जमीन छिनने का गम

Due to misinterpretation of the order of the then Collector, thousands of farmers are sorrowed to snatch the land of their forefathers. | तत्कालीन कलेक्टर के आदेश की गलत व्याख्या करने से हजारों किसानों को अपने पुरखों की जमीन छिनने का गम


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जबलपुर13 घंटे पहले

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जबलपुर हाईकोर्ट (फाइल फोटो)

  • सीलिंग की जमीन से जुडे़ आदेश में शासकीय और कोटवारों की भूमि के दस्तावेज जाँचने को कहा था
  • किसान कह रहे – रजिस्ट्री कराने माँग रहे अनुचित पैसे, कलेक्टर से लेकर सीएम तक कर चुके फरियाद

सीलिंग की निजी भूमि की रजिस्ट्री तत्कालीन कलेक्टर के जिस आदेश का हवाला देकर रोकी गई है वैसा आदेश कभी जारी ही नहीं हुआ। जो आदेश 30 जनवरी 2019 को जारी हुआ था, वो सरकारी जमीन के लिए था, क्योंकि तत्कालीन कलेक्टर छवि भारद्वाज ने अनेक सरकारी भूमि की निजी रजिस्ट्री के मामले पकड़ लिए थे।

साथ ही कहा था कि रजिस्ट्री के पहले पंजीयक इस बात की जाँच कर लें कि किसी भी प्रकार से शासकीय भूमि, कोटवारों की सेवा भूमि अथवा सीलिंग की भूमि का रजिस्ट्रीकरण न हो जाए। उन्होंने आदेश में कहा था कि इसके लिए वे संबंधित राजस्व अधिकारियों से अभिमत ले सकते हैं।

वहीं आदेश की गलत व्याख्या करने से हुआ ये कि किसान परेशान हो गए। किसानों ने कहा कि उनके पुरखों की जमीन को विवाद में उलझा दिया है, जो कि गलत है। हालांकि अब तहसीलदार, एसडीएम और सीलिंग सेल के जरिए इन मामलों को निराकृत करने की कोशिश की जा रही है पर किसानों का कहना है कि गलत तरीके से सीलिंग चढ़ा देना उनके गले की फांस बन गया है।

निर्देश स्पष्ट हैं पर कोई मान नहीं रहा
भूमि को लेकर जबलपुर में जिस तरह के मामले सामने आ रहे हैं उनमें पहले से ही यह भी आदेश है कि सब रजिस्ट्रार कॉलम नंबर 12 को ही देखें, कॉलम 3 पर उन्हें ध्यान देने की जरूरत नहीं है। हालाँकि सब रजिस्ट्रार के लिये ये भी आदेश हैं कि वे दस्तावेज के पंजीकरण के दौरान स्टाम्प ड्यूटी देखें कि वह गलत तो नहीं है।

अगर वे कभी विक्रेता का नाम जानना चाहते हैं तभी उन्हें कॉलम 3 देखना चाहिये। कॉलम नंबर 12 में क्या दर्ज है इससे पंजीयक का कोई सीधा संबंध नहीं है, वास्तव में कॉलम नंबर 12 कैफियत का कॉलम कहलाता है जिसमें सामान्य रूप से उन आदेशों के हवाले दर्ज किए जाते हैं जिनके माध्यम से खसरे में कोई परिवर्तन किया जाता है। ये नियम स्पष्ट हैं, लेकिन स्वार्थपूर्ति के कारण उन्हें उलझा दिया गया है।

नियमानुसार यह होना चाहिए
खसरे में जो भी दर्ज किया जाता है उसमें भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों का ध्यान रखा जाता है। वर्तमान में कॉलम नंबर 12 में सीलिंग से प्रभावित कि जो प्रविष्टि की गई है वह बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के की गई है। ऐसी प्रविष्टि एक अवैध प्रविष्टि है और इसे हटाने का दायित्व तहसीलदार का है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 114 के अंतर्गत तहसीलदार को स्वयं ऐसी सभी प्रविष्टियों को हटा देना चाहिए, जो बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के खसरे में की गई हैं।

किसानों की व्यथा-कथा बता रही कि वो कितने परेशान 5 एकड़ जमीन वह भी चली गई
महाराजपुर निवासी शंकर सिंह का कहना है कि पुरखों के जमाने से महाराजपुर में हमारी जमीन थी, भाइयों में बँटवारा होता गया और जमीन कम होती गई। 5 एकड़ जो जमीन बची थी उसमें भी वर्ष 1992 में लगभग साढ़े 4 एकड़ जमीन सीलिंग में चली गई।

पूरी जमीन सिंचित है हमें अभी खेती करने तो मिल रही है लेकिन इस जमीन में जो फसल लगाते हैं उसे न तो समर्थन मूल्य पर बेच सकते हैं और न ही इस जमीन के बदले कोई लोन मिल रहा है। हमेशा यही डर बना रहता है कि यह जमीन शासन हमसे ले न ले।

मेरी उम्र 70 वर्ष हो गई है और पिछले 28 साल से मैं इस जमीन को सीलिंग के खाते से अलग कराने जुटा हूँ पर कुछ हो नहीं रहा है। यहाँ से वहाँ चक्कर ही काटने पड़ रहे हैं। तहसीलदार के साथ ही कलेक्टर से भी मुलाकात की, यहाँ तक कि इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री तक से मिल चुके हैं लेकिन हमें भटकाया ही जा रहा है जमीन को लेकर कोई हल नहीं निकल रहा है।

कब्जा लेने आए तो जमीन चली गई
गढ़ा ग्राम में धनवंतरी नगर के आगे शांति नगर क्षेत्र में हमारी 5 एकड़ जमीन है। पिताजी स्व. जागेश्वर प्रसाद राज्य परिवहन निगम में काम करते थे तो वे हमेशा बाहर रहते थे। जमीन पर खेती हो रही थी। सन् 1992 में हमारी जमीन सीलिंग में चली गई। इसका न तो कोई नोटिस मिला और न ही कोई मुआवजा। एक बार जब जमीन पर अधिकारी कब्जा लेने आये तब पता चला कि हमारी जमीन चली गई है।

यह कहना है गढ़ा क्षेत्र में रहने वाले राजेश गिदरोनिया का। उनका कहना है कि परिवार का जीवन-यापन खेती के भरोसे है। अभी भी गेहूँ की फसल लगी है, अपनी जमीन को सीलिंग से अलग कराने पिछले कई वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं लेकिन कुछ नहीं हो रहा है। अधिकारी इसमें कुछ नहीं कर रहे हैं जबकि मामला कलेक्टर कोर्ट में भी पहुँच चुका है फिर भी कुछ नहीं हुआ। 5 एकड़ में से 16400 स्क्वेयर फीट जमीन में छूट मिली है इसमें भी चार हिस्से हैं जिसमें एक भाई और दो बहनें शामिल हैं।

अधिकारियों का कहना
इस मामले में अधिकारियों का कहना है कि धारा 115 के तहत किसी भी राजस्व रिकॉर्ड में सुधार करना है तो उसका आवेदन संबंधित एसडीएम के पास प्रस्तुत किया जायेगा। लेकिन उसमें इस बात का ध्यान रखा जायेगा कि जिस रिकॉर्ड में सुधार किया जा रहा है वह 5 साल पहले का तो नहीं है। अगर ऐसा है तो इस प्रकरण को कलेक्टर के पास परमीशन के लिये भेजा जायेगा। अगर कोई दस्तावेज में सुधार 5 साल से कम का है तो उसमें एसडीएम अपने स्तर पर सुधार कर सकता है। अगर संबंधित अधिकारी को यह समझ में आता है कि इसमें शासकीय हित प्रभावित हो सकता है तो प्रकरण कलेक्टर के पास भेज दिया जाता है।



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