चंदवारा (मोहगांव विकासखंड, मंडला जिला, मध्य प्रदेश): अप्रैल 2026 की दोपहर के 2 बजे सूरज तप रहा है. गांव की गली में 45 वर्षीय बाई सिर पर खाली घड़ा लिए तेज-तेज कदम बढ़ा रही हैं. उनके पीछे 10 वर्षीय पोती रानी बाल्टी थामे दौड़ रही है. “बेटा, जल्दी कर… पूछने पर सुशीला रुकती हैं, आंखों में थकान और गुस्सा साफ दिखता है. इस गांव में नल ही लगे हैं, उसे किसी पाइप लाइन नहीं जोड़ा गया. किसी भी घर में नल से पानी नहीं आता. जबकि सरकारी रिकॉर्ड में सब ठीक है. मोहगांव विकासखंड के अधिकारी ने कहा, “काम प्रगति पर है. कुछ गांवों में पाइपलाइन बिछाने और कनेक्शन में तकनीकी देरी हुई है. जल्द पूरा कर दिया जाएगा.” लेकिन गांववाले आरोप लगाते हैं कि यह देरी सालों से चल रही है और कोई जवाबदेही तय नहीं हो रही. जिला जल जीवन मिशन अधिकारी ने शिकायत दर्ज करने की बात कही है.
“हर घर नल, हर घर जल… सरकार का नारा तो सुना होगा ना? यहां नल तो लग गए, लेकिन पानी का नामोनिशान नहीं. नल जमीन पर खड़े हैं जैसे कोई सजावट का सामान. कोई पाइप नहीं, कोई कनेक्शन नहीं. मन करे तो उठाकर कहीं और रख दो. ये नल नहीं, मजाक हैं!” यह मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल मंडला जिले के मोहगांव विकासखंड के छोटे से गांव चंदवारा की कड़वी सच्चाई है. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन के तहत ‘हर घर नल, हर घर जल’ का दावा यहां पूरी तरह धराशायी हो चुका है. सरकारी फाइलों और डैशबोर्ड में गांव 100% कवरेज दिखाता है. करोड़ों रुपये खर्च होने का रिकॉर्ड है. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है.
करोड़ों की खुदाई, लेकिन पाइप लापता
गांव में घूमते हुए हर मोहल्ले में चमचमाते नल नजर आते हैं. नीचे छोटा कंक्रीट प्लेटफॉर्म, ऊपर स्टील या पीवीसी का नल. लेकिन ज्यादातर नल जमीन से 2-3 फीट ऊपर ‘खड़े’ किए गए हैं. कोई मुख्य पाइपलाइन नहीं जुड़ी. कोई बोरवेल या टैंक से कनेक्शन नहीं. ठेकेदार ने बस नल गाड़ दिए और फोटो खिंचवा ली. गांव के 65 वर्षीय यादव बताते हैं, “पिछले साल ठेकेदार आए. बोले-नल लगवा लो, जल्द पानी आएगा. लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हुए. खुदाई हुई, पाइप आए और ले गए. अब पाइप कहां गायब हो गए? मुख्य लाइन कभी बिछाई ही नहीं गई. अब नल खड़े हैं. हम अभी भी 2-2.5 किलोमीटर दूर जंगल के नाले से पानी ढो रहे हैं. महिलाएं और बच्चियां रोज 4-5 घंटे पानी के लिए भटकती हैं.”
सरकारी रिपोर्ट में गांव ‘प्यासा नहीं’
जल जीवन मिशन की आधिकारिक रिपोर्ट और जिला पोर्टल पर चंदवारा ‘पूर्ण’ श्रेणी में दर्ज है. नल कनेक्शन दिए गए, पाइपलाइन बिछाई गई- सब लिखा है. लेकिन गांववाले हंसते हुए कहते हैं, बड़े साहब का पता नहीं, यहां पानी नहीं है; आप खुद देख लो. नल लगा दिए, फोटो ले ली, नल लगा, ऐसे कागज पर कुछ लिखा पढ़ी हुई, फिर हमारे यहां पानी नहीं है. महिला समूह की बाई कहती हैं, “हमने पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर कई बार शिकायत की. जवाब मिलता है- काम पूरा हो गया है, फाइल ठीक है. लेकिन जब नल से एक बूंद पानी नहीं आता तो फाइल से क्या फायदा? हमारे बच्चे गंदा पानी पीकर बार-बार बीमार पड़ रहे हैं. दवा पर भी पैसा खर्च हो रहा है.”
आदिवासी परिवारों पर सबसे ज्यादा बोझ
चंदवारा में ज्यादातर परिवार गोंड और बैगा आदिवासी समुदाय के हैं. ये लोग खेती, मजदूरी और जंगल से उपज पर निर्भर हैं. पानी की कमी से महिलाओं और लड़कियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है. स्कूल जाने वाले बच्चे भी सुबह-सुबह पानी लाने में लग जाते हैं. गर्मी बढ़ते ही स्थिति और भयावह हो जाती है. गांव के युवा (28 वर्ष) पुरानी फोटो दिखाते हुए कहते हैं, “देखिए, ठेकेदार ने खुदाई की थी. पाइप डाले थे. फिर गायब. अब नल ऊपर खड़े हैं. इन्हें कोई भी उठाकर ले जा सकता है. ये ‘चलते-फिरते नल’ हैं लेकिन यहां हर घर प्यासा है.”