एक बार भी चुनाव न हारने का अनूठा रिकॉर्ड बनाने वाली राजमाता विजयाराजे का सियासत में आना अपने पति को सरकार के गुस्से से बचाने का एक उपाय भर था. 1957 के चुनाव से पहले ग्वालियर महत्वपूर्ण क्षेत्र इसलिए था क्योंकि यहां 8 लोकसभा सीटें थीं और 60 विधानसभा. यहां हिंदू महासभा का गढ़ बन चुका था और 1962 के चुनावों में जीवाजीराव सिंधिया का समर्थन इस संगठन को मिल गया था.
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यह गठजोड़ कांग्रेस को खल रहा था इसलिए लगातार ऐसे संदेश भेजे जा रहे थे, जो ग्वालियर के महाराज जीवाजीराव यानी विजयाराजे के पति के लिए निकट भविष्य में खतरनाक साबित हो सकते थे. लेकिन जीवाजी अपने घुड़दौड़ के शौक में ही मसरूफ थे. पत्रकार हरिहर स्वरूप ने लिखा था कि विजयाराजे ने खतरे को भांपकर दिल्ली का रुख किया और पंडित नेहरू से मुलाकात कर बताया कि महाराज कांग्रेस के विरोधी नहीं थे. यह बातचीत कुछ इस तरह हुई.
युवावस्था में विजयाराजे सिंधिया की यादगार तस्वीर.
नेहरू : ठीक है, महाराज हमारे खिलाफ नहीं हैं तो अब वो साबित करें कि हमारे साथ हैं. कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उन्हें संसद में आना होगा.
विजयाराजे : लेकिन पंडित जी, उन्हें सियासत से कोई मतलब नहीं हैं. वो कांग्रेस के लिए कभी उम्मीदवारी नहीं करेंगे. यही तो मैं आपको ठीक से बताने आई हूं.
नेहरू : तो फिर, आप कांग्रेस की उम्मीदवार बनिए. पंत जी और शास्त्री जी पार्टी के टिकटों की व्यवस्था देख रहे हैं, आप उनसे मिल लीजिए.
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गठजोड़ टूटा और फिर सियासी प्रयोग
विजयाराजे न चाहते हुए भी कांग्रेस से जुड़कर राजनीति में आने पर मजबूर हुईं क्योंकि जीवाजी राव ने भी यही तय किया. लेकिन पंडित नेहरू के न रहने के बाद कांग्रेस के साथ उनके मतभेद तेज़ी से सामने आए और 1967 के चुनाव से पहले ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा के साथ उनके गतिरोध बढ़ गए. इसका नतीजा बड़ा ही विचित्र हुआ.
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चूंकि सियासत में विजयाराजे नई थीं और उस वक्त कांग्रेस के विकल्प तलाशने की कवायद देश की राजनीति में ही प्रयोग साबित हो रही थी इसलिए विजयाराजे ने जनसंघ के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव. दोनों चुनाव जीतने वाली विजयाराजे ने जन संघ के साथ आगे जाना तय किया.
वो सीक्रेट प्लान, जिससे गिरी मप्र सरकार
डीपी मिश्रा के बर्ताव को विजयाराजे दिल पर ले चुकी थीं और मप्र की राजनीति में अब वो राजमाता का दर्जा पा चुकी थीं. मिश्रा की सरकार को गिराने के लिए उन्हीं के मंत्री गोविंद नारायण सिंह ने 30 कांग्रेस विधायकों को साथ लेकर एक सीक्रेट प्लान बनाया, जिसमें राजमाता की अनकही सहमति शामिल थी. अचानक मिश्रा की सरकार गिर गई और पहली बार मप्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी.
मध्य प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण रहीं राजमाता सिंधिया ने प्रदेश के बाहर भी सियासी कीर्तिमान बनाए.
‘संयुक्त विधायक दल’ नाम के गठबंधन ने सरकार बनाई जिसमें राजमाता सर्वोच्च नेता बनीं और सिंह मुख्यमंत्री. हालांकि यह प्रयोग डेढ़ साल चल सका और फिर राजमाता व सिंह के बीच मतभेद हो गए और मिश्रा की कांग्रेस सरकार गिराने वाले सिंह फिर कांग्रेस में चले गए.
खुद नहीं हारीं, लेकिन ‘धर्मसंकट’ में वाजपेयी को जिता नहीं सकीं
ग्वालियर क्षेत्र में अपने दबदबे के लिए राजमाता मशहूर रहीं. कहा जाता था, पूरे प्रदेश में वो जिस सीट से खड़ी हो जाएं, वहां से जीत सकती थीं. चूंकि राजमाता के बेटे माधवराव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार हो चुके थे इसलिए 1984 के चुनाव में राजमाता के सामने धर्मसंकट की स्थिति बनी क्योंकि माधवराव के खिलाफ अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव का पर्चा भर दिया था.
बेटे के खिलाफ चुनाव अभियान छेड़ने में राजमाता के सामने पसोपेश थी कि वो पार्टी के साथ कैसे न्याय करें. वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह के मुताबिक वाजपेयी ने खुद को राजमाता का ‘धर्मपुत्र’ घोषित किया और कुछ ही समय के भीतर राजमाता अपने बेटे माधवराव के खिलाफ वाजपेयी के प्रचार में उतरीं. हालांकि वाजपेयी यह चुनाव बड़े अंतर से हार गए. यह तकरीबन वैसा ही मौका था, जब लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी ललिता शास्त्री ने बेटे सुनील के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह के पक्ष में चुनाव अभियान में हिस्सा लिया था.
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खराब सेहत के चलते 1990 के दशक के आखिर में राजमाता ने राजनीति से दूरी बना ली थी, लेकिन आखिर तक भाजपा में सम्मानित हैसियत के साथ रहीं. राम मंदिर से जुड़ा आंदोलन हो या भाजपा की प्रगति यात्रा, हर मोड़ पर राजमाता प्रमुख भूमिका के लिए याद की जाती रही हैं. उथल पुथल भरे इस सियासी जीवन के साथ ही उनका निजी जीवन कई त्रासदियों का दस्तावेज़ बन गया. राजमाता की पर्सनल लाइफ के कुछ फैक्ट्स :
* नौ साल की उम्र में मां को खोया.
* उनकी कस्टडी के लिए उनके पिता और नानी भिड़े. नानी ने ही उनकी परवरिश की.
* पिता ने उनसे सिर्फ छह साल बड़ी लड़की से दूसरी शादी कर ली.
* उनके पति का देहांत बमुश्किल 45 बरस की उम्र में हो गया था.
* उनकी बड़ी बेटी युवावस्था में ही नहीं रही थीं.
* इकलौते बेटे के साथ संपत्ति को लेकर विवाद चला. मां-बेटे के बीच कई आरोप प्रत्यारोप ओछे स्तर तक भी पहुंचे और वसीयत में उन्हें लिखना पड़ा कि अंतिम संस्कार बेटा नहीं करेगा.
* इंदिरा गांधी के समय में लगी इमरजेंसी में पुलिस अत्याचारों के लिए भी राजमाता ने माधवराव पर गंभीर आरोप लगाए थे.
राजमाता की याद में 100 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया गया.
सौम्य, शालीन और विनम्र छवि
ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों के बावजूद राजमाता को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वो बेहद सहज महिला थीं. कोई उन्हें ‘प्रिंसेस’ या ‘राजकुमारी’ कहता था, तो वो इसका विरोध करती थीं. ‘मुझे सब लेखी देवी ही कहते हैं, वही कहिए’, अक्सर दूसरों को इसी तरह टोकती थीं. स्वरूप के मुताबिक जब जीवाजीराव की तरफ से शादी के लिए औपचारिक प्रस्ताव उन तक पहुंचा था, तब भी यही हुआ था.
‘आपको मेरे सामने ‘मुजरा’ करने की ज़रूरत नहीं है.’
‘लेकिन यह सम्मान हम अपनी महारानी को दिया ही करते हैं, महारानी.’
सिंधिया घराने की परंपरा के अनुसार महारानी के सामने झुककर उनके चरण स्पर्श किए जाते थे. इस मुजरे के लिए सबको मना करने वाली लेखी देवी का नाम सिंधिया घराने की परंपरा के अनुसार ही बदलकर महारानी विजयाराजे सिंधिया रखा गया था. नाम बदलने से चुनाव मैदान में तो उन्हें ‘विजय’ मिलती ही रही, लेकिन जीवन के मैदान में यही कहावत चरितार्थ हुई कि ‘नाम में क्या रखा है!’