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प्रवीण कुमार के बारे में हाल ही में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि उन्हें अपनी एक आँख से धुंधला दिखता था. बचपन में एक हादसे (एक खेल के दौरान आँख में चोट) की वजह से उनकी एक आँख की रोशनी काफी कम हो गई थी. ताज्जुब की बात यह है कि उनके साथ खेलने वाले दिग्गज खिलाड़ी और करीबी साथी यहां तक की कप्तान भी कभी इस बात को भांप नहीं पाए.
तेज गेंदबाज प्रवीण कुमार ने एक आंख से खेला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट, पटौदी के बाद बने दूसरे खिलाड़ी
नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी आए जिन्होंने अपनी प्रतिभा से दुनिया को चौंकाया, लेकिन प्रवीण कुमार की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है. मेरठ की गलियों से निकलकर लॉर्ड्स के मैदान तक का उनका सफर जितना रोमांचक है, उससे कहीं ज्यादा हैरान करने वाला है उनका वो राज जो उन्होंने सालों तक दुनिया से छिपाए रखा.
क्रिकेट की दुनिया में अनुशासन और बारीकियों का बहुत महत्व है. गेंदबाज अपना रन-अप इंच-दर-इंच नापते हैं ताकि उनकी लय न बिगड़े. लेकिन भारतीय क्रिकेट में एक ऐसा ‘अजूबा’ गेंदबाज भी हुआ जिसने अपने पूरे करियर में कभी फीते या कदम से अपना रन-अप नहीं नापा. वह थे स्विंग के सुल्तान प्रवीण कुमार.
एक राज जो साथियों से भी रहा ओझल
प्रवीण कुमार के बारे में हाल ही में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि उन्हें अपनी एक आँख से धुंधला दिखता था. बचपन में एक हादसे (एक खेल के दौरान आँख में चोट) की वजह से उनकी एक आँख की रोशनी काफी कम हो गई थी. ताज्जुब की बात यह है कि उनके साथ खेलने वाले दिग्गज खिलाड़ी और करीबी साथी यहां तक की कप्तान भी कभी इस बात को भांप नहीं पाए. मंसूर अली खान पटौदी के बाद, प्रवीण दूसरे ऐसे भारतीय क्रिकेटर बने जिन्होंने अपनी दृष्टि की इस चुनौती को कभी अपनी गेंदबाजी के आड़े नहीं आने दिया.
कैसे लगी थी चोट?
जूनियर क्रिकेट खेलते समय गेंद लगने से कुमार की दाहिनी आंख में गंभीर चोट आ गई, जिसके परिणामस्वरूप उस आंख की रोशनी कम हो गई. उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज कराया, जहां डॉक्टरों ने प्रत्यारोपण न करने की सलाह दी और चेतावनी दी कि इससे दृष्टि और खराब हो सकती है.
कुमार ने बताया कि दृष्टि कम होने के कारण बल्लेबाजी के दौरान उन्हें गेंदों, विशेष रूप से बाउंसर और धीमी गेंदों को पहचानने में कठिनाई होती है, हालांकि वह सफलतापूर्वक गेंदबाजी करने में सक्षम रहे. उन्होंने खुलासा किया कि उनके खेलने के दिनों में, भारतीय टीम में उनके साथियों में से केवल एक को ही उनकी इस स्थिति के बारे में पता था.
बिना नापे दौड़ना और सटीक लाइन-लेंथ
प्रवीण का गेंदबाजी अंदाज सबसे जुदा था एक तरफ जहाँ आधुनिक गेंदबाज तकनीक और डेटा पर निर्भर रहते हैं, वहीं प्रवीण पूरी तरह अपने अंदाजे और सहज बोध पर भरोसा करते थे. उन्होंने कभी अपना रन-अप नहीं मार्क किया वे बस आते, गेंद थामते और एक प्राकृतिक लय के साथ दौड़ना शुरू कर देते उनका निशाना इतना सटीक था कि बल्लेबाजों के पास उनकी इन-स्विंग और आउट-स्विंग का कोई जवाब नहीं होता था.
2011 का इंग्लैंड दौरा: स्विंग का मास्टरक्लास
2008 ऑस्ट्रेलिया में सीबी सीरीज के हीरो रहे प्रवीण कुमार के करियर का सबसे सुनहरा दौर 2011 का इंग्लैंड दौरा था जब भारत के अन्य गेंदबाज संघर्ष कर रहे थे, तब लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर प्रवीण की स्विंग होती गेंदों ने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने उस सीरीज में अपनी जादुई गेंदबाजी से लॉर्ड्स के ‘ऑनर्स बोर्ड’ पर अपना नाम लिखवाया और साबित किया कि प्रतिभा किसी शारीरिक कमी की मोहताज नहीं होती.
प्रवीण कुमार का करियर हमें सिखाता है कि अगर आपके पास अटूट आत्मविश्वास और प्राकृतिक हुनर है, तो आप दुनिया की बड़ी से बड़ी बाधा को पार कर सकते हैं. एक आँख से धुंधला दिखने के बावजूद, उन्होंने जिस तरह से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को अपनी उंगलियों पर नचाया, वह भारतीय क्रिकेट के इतिहास का एक अनसुना और प्रेरक अध्याय है.