Balaghat News: मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी समुदाय को नक्सलवाद से मुक्ति मिलने के बाद अब उन्हें माइनिंग का खौफ सता रहा है. दरअसल, जिस जंगल, पहाड़ और झरने से उनका जीवन चलता था, अब माइनिंग के आ जाने से प्रकृति के उजड़ने की आशंका है. एक ऐसा ही जल स्त्रोत जो किसी चमत्कार से कम नहीं. हम बात कर रहे हैं पचामा दादर की, जहां पर बॉक्साइट खनन के लिए माइनिंग प्रस्तावित है. ऐसे में आदिवासी समुदाय का आरोप है कि सरकार के इस फैसले से उनके प्राकृतिक जल स्रोत नष्ट हो जाएगा, जिससे उनका जीवन पूरी तरह प्रभावित हो जाएगा.
पूरा जल स्त्रोत प्राकृतिक
पचामा दादर बालाघाट के दक्षिण बैहर की घने जंगलों और पहाड़ियों स्थित है. वहीं, से अनगिनत झरने निकलते हैं, जो आधा दर्जन गांव इसी के भरोसे जीवन चलाते हैं. इसमें बम्हनी, हर्रा टोला, कोंगेवानी, पालाघोंदी सहित कई गांवों तक पहुंचता है. ऐसे में अब वह पहाड़ नष्ट हो जाएंगे, तो ग्रामीणों का समस्या कई गुना बढ़ जाएगा.
पहले थी जटिल समस्या
ग्रामीण बताते हैं कि वहां पर पानी की भयंकर समस्या थी. ऐसे में खेती तक नहीं होती थी. ऐसे में लोग सिर्फ कोदो-कुटकी और ज्वार ही बड़ी मुश्किल से उगा पाते थे. उस गांव में न तो कोई अपनी बेटी देना चाहता था और न ही उस गांव से बेटी मांगना चाहता था. वहीं, जब मेहमान आते थे, तो लोग पानी की समस्या के चलते अपने घरों का दरवाजा बंद कर देते थे. दरअसल, पचामा दादर की पहाड़ियों से झीरिया बहता था. लेकिन, वह गांव तक नहीं पहुंच पाता था. ऐसे में बच्चे से लेकर बूढ़े तक पानी के लिए दिनभर पहाड़ पर चढ़ते और झिरिया से पानी मटके में भरते और नीचे उतरते थे. ऐसे में जब उस इलाके में माइनिंग होगी, तो उनका पानी का स्त्रोत खत्म हो जाएगा.
रातोंरात बना ली थी नाली
अब से करीब 15 साल पुरानी बात है, जब ग्रामीणों ने आपस में एक मीटिंग की और उस मीटिंग ये तय हुआ ग्रामीण मिलकर ही पानी को झिरिया से नीचे लाएंगे. लेकिन, इसके लिए वन विभाग वहां काम के लिए आपत्ति दर्ज करता रहा. ग्रामीणों ने रातोंरात ही इस समस्या का निदान निकाल लिया. सभी बच्चे, महिलाएं और पुरुषों ने पहाड़ के पानी को गांव तक ले आए. इसके बाद उन्होंने साबित कर दिया कि बिना फिजिक्स पढ़े भी उसका इस्तेमाल किया जा सकता है. उस ढलान का इस्तेमाल कर पानी जमीन तक आ जाता है.
खुद पहुंचे थे कलेक्टर
वरिष्ठ पत्रकार रफी अंसारी ने लोकल 18 को बताया कि उस समय डॉ. नवनीत कोठारी ने उस समय उन गांवों का दौरा देखा था. इसके बाद उन्होंने उस इलाके की न सिर्फ पानी की समस्या को समझा, बल्कि उनके काम की तारीफ भी की. इसके बाद उन कच्ची नालियों को पक्का करने का भी काम किया गया. फिर क्या था उस गांव में खुशहाली आ गई. अब ग्रामीण न सिर्फ अपनी प्यास बुझा रहे हैं, बल्कि अपने खेत में मनचाही फसलों को भी बो रहे हैं.
गलत रिपोर्ट बनाई गई
इस परियोजना के सफल होने के बाद आसपास के करीब 8 गांवों में इसका पानी पहुंच पा रहा है. खास बात ये कि गांवों में जल जीवन मिशन की तहत पानी पहुंच रहा है, उसमें विद्युत की जरूरत नहीं है. ऐसे में गांवों में 24 घंटे पानी आता है. वहीं, गर्मियों में पानी की समस्या नहीं होती है. लेकिन अब जहां पर प्राकृतिक जल स्त्रोत है, वहीं पर बॉक्साइट खनन की तैयारी की जा रही है. ऐसे में स्थानीय लोगों का आरोप है कि पर्यावरणीय रिपोर्ट बनाई गई, तब इस बात को छिपाया गया. लेकिन अगर यहां पर माइनिंग होगी, तो इलाके में पानी की गंभीर समस्या होगी.