मप्र में करीब 7 लाख सरकारी शिक्षक हैं। इन्हें अक्सर विभागीय कामों से संभागीय मुख्यालय आना पड़ता है। इन्हें महंगे होटलों में न रुकना पड़े, इस मकसद से प्रदेश में 12 शिक्षक सदन बनाए गए थे। इनमें मात्र 70 रुपए प्रतिदिन के शुल्क पर ठहरने की सुविधा उपलब्ध थी। लेकिन, ये योजना ज्यादा दिन नहीं चल पाई। आज ये भवन या तो जर्जर हो चुके हैं या दूसरे सरकारी विभागों ने ही इन पर कब्जा कर लिया है। इसका नतीजा ये है कि दूरदराज से आने वाले शिक्षकों को या महंगे होटल या रिश्तेदारों के यहां शरण लेनी पड़ती है। खासकर शिक्षिकाओं की परेशानी इससे बढ़ जाती है। मप्र शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष छत्रवीर सिंह राठौर का कहना है कि हमने शिक्षक कल्याण परिषद में ये मांग उठाई है कि इन सदनों को तुरंत खाली कराकर दुरुस्त किया जाए और देखरेख की जिम्मेदारी शिक्षक संगठनों को सौंपी जाए। योजना… संभागीय मुख्यालयों पर बने थे भवन, नाममात्र शुल्क पर थी व्यवस्था इंदौर : साइकिल और किताबें भरीं खजराना मंदिर के पास 16 कमरों वाला शिक्षक सदन 1995 में शुरू हुआ था। 2005 तक शिक्षक इसमें रुकते रहे फिर कार्यालयीन उपयोग शुरू हो गया। विभाग ने इसे स्टोर रूम बनाकर बच्चों की साइकिलें और किताबें ठूंस दी। जब शिक्षकों ने विरोध किया, तो प्रशासन ने सुधार करने के बजाय भवन पर ताला जड़ दिया, जिससे बिल्डिंग अब धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। करीब 8 साल से यही स्थिति है। जबलपुर: यहां तो होटल बनाकर कमाई 21 कमरों वाले शिक्षक सदन भेड़ाघाट का उद्घाटन 1995 में हुआ था। 2020 तक इसे कलेक्टर दर पर संचालित किया गया। शिक्षकों से 50 रुपए पूरे दिन के लिए जाते थे। मार्च 2020 से कोविड के कारण भेड़ाघाट का पर्यटन खत्म हो गया। दो साल सदन बंद रहा। 2022 में इसे मात्र 5000 रुपए प्रतिमाह पर निजी हाथों में सौंप दिया गया, जिसके बाद इसे हॉलीडे होम नाम देकर गेस्ट हाउस में बदल दिया।
टीकमगढ़: दुकानें बनवा दीं, शिक्षकों का प्रवेश ही मुश्किल… यहां मामला जमीन बचाने के नाम पर शुरू हुआ। कोतवाली के पास बेशकीमती जमीन पर कब्जे के उद्देश्य से शिक्षक सदन के नाम पर विधायक निधि से भवन और दुकानें बनवा दी गईं। वर्तमान में यह पूरी तरह स्थानीय विधायक के नियंत्रण में है और शिक्षकों का प्रवेश ही दुर्लभ है। उज्जैन में 18 कमरों वाला सदन, अब खंडहर…
यहां भी लोक शिक्षण कार्यालय परिसर में 1995 में शिक्षक सदन शुरू किया गया था। 18 कमरों वाला ये सदन अब पूरी तरह जर्जर होकर खंडहर बन चुका है। दस साल पहले तक यहां शिक्षक रुकते थे, अब बंद है। कब्जे हटाने कानूनी प्रक्रिया चल रही…
हम सभी शिक्षक सदनों को अपने नियंत्रण में लेने और सुधारने की कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं। कब्जे हटाने की कानूनी प्रक्रिया पर चर्चा चल रही है। जल्द इन्हें नया स्वरूप दिया जाएगा।’ -आरएस मिश्रा, प्रभारी, राष्ट्रीय शिक्षक कल्याण प्रतिष्ठान
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