बघेलखंड की विरासत दुलदुल घोड़ी नृत्य हो रहा गुम, कभी शादियों की शान थी ये कला

बघेलखंड की विरासत दुलदुल घोड़ी नृत्य हो रहा गुम, कभी शादियों की शान थी ये कला


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बघेलखंड के सार्वजनिक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में दुलदुल घोड़ी का डांस एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है दुलदुल घोड़ी में एक आदमी चमकदार वेशभूषा में रहता है. उसके सिर पर पगड़ी होती है.हाथों में घोड़े की कमान होती है. घोड़े की जगह घोड़े का मुखौटा होता है लेकिन देखने में ऐसा लगता है कि यह आदमी घोड़े के ऊपर बैठा हुआ है लेकिन यह घोड़े का एक ढांचा है.

बघेलखंड के पुराने लोगों ने दुलदुल घोड़ी जरूर देखी होगी. सार्वजनिक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में अक्सर दुलदुल घोड़ी का नृत्य होता था. इसमें कुछ लोग घोड़ी का मुखौटा और ढांचा लेकर नाचते हैं. देखने में बिल्कुल ऐसा लगता है कि जैसे कोई आदमी घोड़े पर बैठा हो और घोड़ा डांस कर रहा हो. यह परंपरा राजा महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है. पहले लोग केवल इसका नृत्य देखते थे अब इसकी प्रस्तुति मंचों पर ही देखने को मिलती है. अब दुलदुल घोड़ी के साथ सेल्फी खिंचवाने का भी चलन है.

मध्यप्रदेश में बघेलखांड का इलाका न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए बल्कि स्थानीय प्राचीन परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के लिए भी जाना जाता है. यहां के स्थानीय लोक नृत्य लोकगीत आज भी प्रचलन में है. शादियों में या उत्सव के किसी भी कार्यक्रम में पहले बघेलखंड का मशहूर लोक नृत्य दुलदूल घोड़ी हर घर में हुआ करता था. रीवा के कलाकार रंगकर्मी राजमणि तिवारी भोला के द्वारा आज भी इस कला को जीवित रखा गया है. दुलदुल घोड़ी का प्रदर्शन देश के कई राज्यों के बड़े मंचो पर राजमणि तिवारी भोला कर रहे है.

पारंपरिक लोक नृत्य लिल्ली घोड़ी
कलाकार राजमणि तिवारी भोला ने बताया कि बघेलखंड में पहले बहुत सी कलाए थी जो काफी समृद्ध थी. दुलदुल घोड़ी भी उनमें से एक लोकनृत्य था. इस लोकनृत्य को लिल्ली घोड़ी लोकनृत्य भी कहा जाता है. लेकिन बदलते दौर के साथ पश्चात संस्कृति ने इन कलाओं को काफी नुकसान पहुंचाया है. आज के दौर में डीजे की धुन में थिरकना लोग पसंद करते है. अपने कलाओं को जीवित रखने की रुचि अब लोगों में नहीं है. यह नृत्य उत्साह और उत्सव का प्रतीक है. बघेलखंड में जब पहले शादी ब्याह हुआ करते था. उसमे व्यक्ति विदूषक के रूप में काठ यानी लकड़ी की घोड़ी पहन कर बारात के आगे आगे बड़ा उत्साह से चला करता था. उसको लोग बड़े ही प्यार से बुलाते थे. वो सभी का मनोरंजन किया करता था. उस समय मेले में त्योहारों दुलदुल घोड़ी का नृत्य करने वाले आसानी से मिल जाते थे.

उत्सव और उत्साह का प्रतीक.
कलाकार राजमणि तिवारी भोला ने बताया कि पहले कलाकार अपने नृत्य के जरिए लोकगीत के माध्यम से समसामयिक समस्याजों पर बात किया करते थे. समाज की बुराइयों को लेकर जागरूक भी किया करते थे. इसी लोक नृत्य के माध्यम से पहले लोगों का मनोरंजन किया जाता था. उसी से उन कलाकारों को कुछ पैसे भी मिल जाते थे.धीरे धीरे समय बदलता गया चीजें बदलती गई है. और धीरे धीरे बैंडवाजा और डीजे संस्कृति के कारण ऐसे बहुत से कलाकार है जिनका जीवन यापन ही संकट में पड़ गया. इसलिए अब पुराने कलाकारों ने इस कला को छोड़ दिया. लोग अब लोक कला करने के बजाय मजदूरी करना बेहतर समझने लगे हैं. राजमणि तिवारी भोला ने बताया कि मैं अभी भी इस कला का प्रदर्शन कर रहा हूं. और इस कला को अच्छा से अच्छा मंच देने का प्रयास कर रहा हूं.



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