यहां ‘खून का नशा’ कर रहे युवा, अपना ही ब्लड निकालकर शरीर में कर रहे इंजेक्ट

यहां ‘खून का नशा’ कर रहे युवा, अपना ही ब्लड निकालकर शरीर में कर रहे इंजेक्ट


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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ‘ब्लड किक’ नाम की खतरनाक लत सामने आई है. 18 से 25 साल के युवा अपना ही खून निकालकर वापस शरीर में डाल रहे हैं. डॉक्टरों ने इसे एक गंभीर मानसिक भ्रम और जानलेवा बिहेवियरल एडिक्शन करार दिया है.

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Representative Photo (AI Generated)

भोपाल. नशे की दुनिया में अक्सर नए और डरावने प्रयोग देखने को मिलते हैं, लेकिन भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध हमीदिया अस्पताल में जो मामले सामने आए हैं, उन्होंने चिकित्सा जगत को हिलाकर रख दिया है. यहां 18 से 25 वर्ष के युवाओं में ‘ब्लड किक’ का जुनून सवार हो रहा है. इसमें युवा अपने ही शरीर से खून निकालते हैं, उसे फ्रीज करते हैं और फिर इंजेक्शन के जरिए दोबारा अपने ही शरीर में इंजेक्ट कर लेते हैं. उनका मानना है कि ऐसा करने से उन्हें एक अलग ही तरह की ‘हाइ’ (High) और एनर्जी महसूस होती है, जबकि डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल एक जानलेवा मानसिक भ्रम है. जनवरी से अब तक हमीदिया अस्पताल में ऐसे 5 मामले आ चुके हैं. इन सभी मरीजों की दास्तां एक जैसी ही है.

सबसे पहले उनके माता-पिता ने उनके व्यवहार में भारी बदलाव नोटिस किया. बच्चों की हरकतें धीमी पड़ने लगीं और जब उनसे इस बारे में पूछताछ की गई, तो वे बेहद हिंसक हो गए. जब इन युवाओं को मनोरोग विभाग लाया गया, तब जाकर इस खौफनाक सच का खुलासा हुआ. मनोरोग विभाग के डॉक्टरों ने पाया कि इन मरीजों में शराब या ड्रग्स का कोई पारंपरिक संकेत नहीं था. न तो सांसों में बदबू थी और न ही आंखों में नशीली दवाओं का असर. लेकिन उनके शरीर पर खुद से लगाई गई सुइयों के दर्जनों निशान मौजूद थे. पूछताछ में युवाओं ने बताया कि अपना ही खून शरीर में वापस डालने पर उन्हें एक अद्भुत शांति और ‘सेल्फ कंट्रोल’ महसूस होता है. उन्हें लगता है कि इससे उनके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा है.

‘रिवार्ड सिस्टम’ का मनोवैज्ञानिक जाल
हमीदिया अस्पताल के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. जेपी अग्रवाल ने स्पष्ट किया है कि शरीर में अपना ही खून दोबारा डालने से कोई नशा नहीं होता. उन्होंने बताया, “यह पूरी तरह से एक मानसिक भ्रम और बिहेवियरल एडिक्शन है. इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो और खतरनाक स्टंट्स देखकर युवा ऐसी हरकतों की ओर आकर्षित हो रहे हैं.” वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो जब युवा खुद को सुई चुभाते हैं, तो उस दर्द के बाद मिलने वाली मानसिक राहत को दिमाग एक रेवॉर्ड की तरह देखने लगता है. यह खून के कारण नहीं, बल्कि उस पल महसूस होने वाले रिलीफ की वजह से होता है, जो धीरे-धीरे एक लत बन जाती है.

मौत को दावत देता ‘ब्लड किक’
डॉक्टरों के अनुसार, यह आदत जितनी सुकूनदेह लगती है, उससे कहीं ज्यादा घातक है. अपने ही खून को दोबारा इंजेक्ट करने से शरीर का नेचुरल सिस्टम पूरी तरह ठप हो सकता है. इससे सेप्सिस, HIV, हेपेटाइटिस, नसों का डैमेज होना, ब्लड क्लॉटिंग और अंगों का फेल होना जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं. शरीर में गंभीर संक्रमण फैलने से व्यक्ति की मौके पर ही मौत भी हो सकती है. विशेषज्ञ इसे सेल्फ हार्म (खुद को नुकसान पहुंचाना) की श्रेणी में रखते हैं, जो डिप्रेशन का एक गंभीर संकेत है. भोपाल में सामने आए ये मामले समाज और अभिभावकों के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं. डॉक्टरों ने अपील की है कि अगर बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन या सुस्ती दिखे, तो उसे नजरअंदाज न करें और तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें.

पहले भी बदनाम रहा है हमीदिया
हमीदिया अस्पताल का इतिहास जितना पुराना है, उससे जुड़े विवाद भी उतने ही चौंकाने वाले रहे हैं. ‘ब्लड किक’ के मामलों ने एक बार फिर यहां की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब यहां की खबरों ने प्रदेश को दहलाया हो. साल 2020 में हमीदिया अस्पताल के कोविड वार्ड में बिजली गुल होने और बैकअप फेल होने के कारण कई मरीजों की जान जोखिम में पड़ गई थी. वहीं, साल 2021 में हमीदिया परिसर स्थित कमला नेहरू अस्पताल (जो हमीदिया का ही हिस्सा है) के बच्चा वार्ड में भीषण आग लग गई थी. इस दिल दहला देने वाली घटना में कई नवजातों की असमय मौत हो गई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था.इसके अलावा समय-समय पर अस्पताल में गंदगी, स्ट्रेचर की कमी और जूनियर डॉक्टरों के व्यवहार को लेकर मरीजों के परिजनों के साथ होने वाली झड़पों की खबरें आती हैं.

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Niranjan Dubey

न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें



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