पहाड़ काटने वाली ‘जल सहेलियां’ | – News in Hindi

पहाड़ काटने वाली ‘जल सहेलियां’ | – News in Hindi


किसी को कमज़ोर कहना हो, किसी का विरोध करना हो तो उसे चूड़ियां दे दो, या ये कह दो कि चूड़ियां पहन लो. लेकिन क्यां चूड़ियों वाले हाथ वाकई नाकारे, निकम्मे, कमज़ोर होते हैं? जिन कलाइयों में चूड़ियां होती हैं वो किसी से कमज़ोर होती हैं वो पुरुषों से पीछे होती हैं? ये सारे भ्रम और सारी गलतफहमियां एक झटके में दूर हो जाती हैं जब यही चूड़ी पहने हुई कलाइयां हाथों में घन, फावड़ा, कुदाल लेकर एक पहाड़ काट देती हैं. जी हां ये कोई कहानी नहीं, कोई फिल्म नहीं ना ही फ़साना. ये हक़ीक़त है उस इलाके की जहां की औरतें आधी रात को उठकर कुएं में पानी आने का इंतज़ार करती थी. ख़ूब लड़ाई झगड़े होते थे, घंटों के इंतज़ार के बाद पीने का पानी नसीब होता था. लेकिन इन चूड़ी पहनी हुई कलाइयों ने अपनी मेहनत से अपने गांव की तस्वीर बदल दी है. और उन जल सहेलियों की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है. हर कोई जानना चाहता है कि आख़िर कौन हैं ये जल सहेलियां और क्या कमाल कर दिया है इन्होंने. हम भी मिलने को बेकरार थे इन औरतों से जिन्होंने अपने पहाड़ से इरादों से पहाड़ को काट दिया और खोल दिए पानी के रास्ते.

देश के नक्शे पर अगरौठा
मध्यप्रदेश के छतरपुर ज़िले का एक छोटा सा गांव अगरौठा. जिसकी कोई पहचान नहीं थी वो भी दूसरे गांवों की तरह बिल्कुल सामान्य सा गांव था. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि अचानक से हर कोई इस गांव को पहचानने लगा. मीडिया का जमावड़ा लग गया और जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक अधिकारी सभी पहुंचे इस गांव में. छतरपर से लगभग 95 किलोमीटर दूर अगरौठा सुर्खियों में यहां की महिलाओं की वजह से आया है. गांव की औरतों ने वो कर दिया है, जिसके लिए हिम्मत, ताकत, जज़्बा और मेहनत सब चाहिए. यहां की औरतों ने 18 महीने की जी तोड़ मेहनत के बाद लगभग 107 मीटर का पहाड़ काट दिया और उससे बना दिया एक नाला जिससे पहाड़ से लगा हुआ चंदेलकालीन तालाब में पानी भरने लगा. पहले ये पानी पहाड़ से पीछे से ही पास बहने वाली बछेड़ी नदी में चला जाता था. बुंदेलखंड सालों से सूखे की मार झेल रहा है. यहां का जसस्तर नीचे जा रहा है. इलाके के जल स्त्रोत सूख रहे हैं. लेकिन अब अगरौठा का वाटर लेबिल बढ़ गया है. इस साल कम बारिश होने के बावजूद तालाब में काफ़ी पानी है. गांव के कुएं और हैंड पंप भी पानी दे रहे हैं. लेकिन दो साल पहले के हालात भी इस गांव के वही थे जो बुंदेलखंड के बाकी इलाकों के है. यहां सबसे बड़ी परेशानी पानी की थी.

कैसे शुरू हुआ काम?

औरतों को एकजुट करने का काम किया परमार्थ समाज सेवी संस्था ने. जिसके संस्थापक डॉ संजय सिंह हैं. जल जन जोड़ो अभियान के तरह परमार्थ संस्था बुंदेलखंड के गांवों में जल स्त्रोतों को ज़िंदा करने का काम कर रही है. इसमें स्थानीय महिलाओं को शामिल किया जाता है. संस्था गांव में 20 या 25 महिलाओं की एक पानी पंचायत बनाती है, जिसमें अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष होते हैं. पानी पंचायत की सदस्य महिलाएं फिर गांव की बाकी महिलाओं को पानी के लिए जागरुक करती है उन्हें समझाती हैं. फिर बनाई जाती हैं जल सहेलियां. इन्हें जल सहेलियों ने पहाड़ काटा और पास के तालाब को एक तरह से ज़िंदा किया है. इसके पहले गांव में छोटे छोटे चैक डेम, स्टाप डेम बनाए गए. धीरे धीरे करके गांव का वाटर लेविल बढ़ गया.

छतरपर से लगभग 95 किलोमीटर दूर स्थित अगरौठा गांव यहां की महिलाओं की वजह से सुर्खियों में आया.

कैसे एकसाथ आईं जल सहेलियां?परमार्थ संस्था ने अगरौठा के आसपास के गांव में पहले काम किया था. पनवारी गांव के मिही लाल लगभग 5 साल से जल जन जोड़ो अभियान से जुड़े हैं इन्हें जल योद्धा की उपाधि दी गई है. मिली लाल ने अपने आसपास के इलाकों के तालाबों का जिर्णोधार करवाया है. जहां पीने के पानी की दिक्कत थी यहां आज लोग खेती तक कर पा रहे हैं. अगरौठा गांव में औरतों को समझाने का काम किया 18 साल की लड़की बबीता राजपूत ने. बबीता को शुरु में मुश्किलों सामना करना पड़ा लेकिन बाद में औरतों को बात समझ में आई और वो श्रमदान करने को तैयार हुईं. बबीता कहती हैं कि औरतों को समझाना ज़्यादा मुश्किल नहीं रहा लेकिन गांव के कुछ पुरुषों ने इस काम में रुकावटें डालीं औरतों भड़काया और काम ना करने को कहा. बबीता ने बताया कि अब हमारे गांव में पानी की कोई दिक्कत नहीं है.

60 साल की कली बाई की शादी को 40 साल से ज़्यादा हो गए हमेशा पीने के पानी की दिक्कत रही. गर्मियों में तो आधी आधी रात को पानी के लिए जाना पड़ा. घंटों खड़े रहने के बाद भी लड़ाई झगड़े होते और बामुश्किल दो घड़े पानी मिल पाता. कली बाई कहती हैं कि हमने सर्दी गर्मी में सुबह 10 बजे से शाम तक पहाड़ काटा है. पैरों और हाथों में छाले पड़ गए थे लेकिन पानी आने से उनके छालों की तकलीफ़ कम पड़ गई. कल्लो बाई मायके जाकर अपने माता पिता से कहती थी कि कहां ऐसे गांव में पटक दिया है जहां पीने का पानी तक नहीं है. लेकिन अब वो खुश हैं. गांव की तकरीबन 200 से 250 जल सहेलियों ने अपने बूते पर पानी की मुश्किल दूर कर ली.

हालांकि यहां तक पहुंचने का सफ़र आसान नहीं था, क्योंकि पहाड़ की ज़मीन वन विभाग की थी और उसे काटने की इजाज़त वन विभाग नहीं दे रहा था. लेकिन महिलाएं ज़िद पर अड़ गईं. उन्होंने वन विभाग के अधिकारियों से बात की और समझाया कि एक नाला बन जाने से गांव में पानी ही पानी हो जाएगा. बाद में वन विभाग के अधिकारी भी इस बात पर राज़ी हो गए.

परमार्थ संस्था से जुड़े धनीराम रैकवार ने बताया कि जब वो अगरौठा गांव गए तो देखा कि यहां दो हैंडपंप हैं जिसमें भी पानी सूख जाता है. गांव पहाड़ों से घिरा है लेकिन सारा पानी तालाब में आने के बजाए बछेड़ी नदी में चला जाता है. अगर तालाब और जंगल के बीच में आने वाले पहाड़ को काट देते हैं तो तालाब भर जाएगा. पहाड़ काटने के पहले इलाके में चेक डैम स्टाप डैम, बोर रिचार्ज, कुआं रिचार्ज का काम किया जिससे ज़मीन का वाटर लेबिल बढ़ा. पहाड़ की बड़ी चट्टान को तोड़ने के लिए एक दिन जेसीबी की मदद ली गई लेकिन रोज़ाना 200 के ऊपर जल सहेलियों ने पूरा पहाड़ काट दिया.

जल जन जोड़ो अभियान
इस अभियान की शुरुआत लगभग 25 साल पहले हुई थी. परमार्थ संस्था के फाउंडर डॉ. संजय सिंह ने बताया कि उनकी संस्था पहले वैकल्पिक शिक्षा पर काम करती थी. लेकिन चंबल के इलाके में काम करते वक्त एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य का काम हम खुद कर लेंगे और कुछ करना चाहते हैं तो हमारे इलाके में पानी की दिक्कत दूर कर दीजिए. बस उसके बाद से डॉ. संजय सिंह और उनकी टीम का मक़सद बदल गया. परमार्थ संस्था बुंदेलखंड में पानी को लेकर काम कर रही है. जल जन जोड़ों अभियान के तरह संस्था चंदेलकालीन और बुंलदेकालीन तालाबों को रिवाइव करने काम कर रहे है, 300 अधिक गांवों में पानी पंचायत और जल सहेली बनाईं हैं.

संजय सिंह बताते हैं कि उन्होंने स्थानीय महिलाओं और लोगों के सहयोग से लगभग 1600 से जल स्त्रोत पुनर्जीवीत किए और बनाए. हालांकि इसका ख़ामियाज़ा संजय सिंह को अपने पिता की हत्या के रूप में चुकाना पड़ा. जो लोग नहीं चाहते थे कि परमार्थ संस्था ये काम करे उन्होंने इनके पिता की हत्या कर दी. लेकिन संस्था लगातार अपनी कोशिश में लगी है. पानी को लेकर जो काम हो रहा है वो टीकमगढ़. झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर सबसे ज़्यादा है. अगरौठा के आसपास भी काम हुआ है.

ये जल सहेलियां अपने गांव की भागीरथ हैं, जिन्होंने पहाड़ को काटकर अपने गांव की किस्मत बदल दी. अब यही महिलाएं बछेड़ी नदी पर भी काम करेंगी. घर परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने के बाद भी चट्टान से इरादों वाली महिलाओं ने चट्टान को तोड़ दिया. अब कौन कहेगा कि नाज़ुक कलाइयां कमज़ोर होती हैं.

ब्लॉगर के बारे में

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

और भी पढ़ें





Source link