आत्मनिर्भर महिलाएं: 7 महिला समूहों ने लांच किया देवश्री मिल्क ब्रांड, दूध का उत्पादन बढ़ाने 4 प्रजाति की गाय-भैंसों में करा रहीं कृत्रिम गर्भाधान

आत्मनिर्भर महिलाएं: 7 महिला समूहों ने लांच किया देवश्री मिल्क ब्रांड, दूध का उत्पादन बढ़ाने 4 प्रजाति की गाय-भैंसों में करा रहीं कृत्रिम गर्भाधान


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सागर2 घंटे पहले

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केसली मेें बाड़े में रखकर कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से तैयार किए जा रहे उन्नत नस्ल के दूध देने वाले पशु।

  • सागर के केसली में स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने अजीविका के रूप में अपनाया

जिले केसली में महिलाएं आत्मनिर्भर की ओर कदम बढ़ा रही हैं। करीब सात महिला समूहों ने देवश्री ब्रांड के नाम से मिल्क प्रोडक्ट बाजार में उतारे हैं। अब इन प्रोडक्ट की मांग बढ़ने के साथ दूध उत्पादन को बढ़ाए जाने की ओर फोकस करना शुरू किया है। महिलाओं ने गायों में गिर, जर्सी, साहीवाल, थारपारकर और भैंस में मुर्रा नस्ल के सांडों का बीज कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से डलवाकर नस्ल सुधार कार्यक्रम शुरू किया, जिससे दूध उत्पादन बढ़ सके।

150 आदिवासी परिवार जुड़े

सोनपुर गांव में करीब 150 आदिवासी परिवार देवश्री फॉमर्स प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़कर दूध उत्पादन में लगे हैं। गांव में 7 स्व सहायता समूहों का गठन किया गया है। इनमें सोनम, कविता, गोपाल-कृष्ण समूह, सरस्वती, सीताराम और लक्ष्मी समूह से करीब 70 परिवारों की महिलाएं जुड़ी हैं। महिलाएं इससे पहले पुराने तरीके से धान और मौसमी फसलों की खेती करती थीं। देवश्री फर्म के माध्यम से पहले तो उन्होंने बाजार से अधिक दूध उत्पादन करने वाले पशु खरीदे और बाद में कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से वे स्वयं घरों में ही पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम के आधार पर उन्नत नस्ल के पशु तैयार कर रही हैं।

16 गांवों में 300 पशुओं का कराया कृत्रिम गर्भाधान

महिलाओं को कार्यक्रम में आजीविका मिशन और पशुपालन विभाग का सहयोग भी मिल रहा है। गांव में 6 से अधिक परिवारों ने, भोंहारा गांव में 8 परिवारों ने 20 पशुओं, पठा में 12 परिवारों ने 38 पशुओं, डोमा में 13 परिवारों ने 32 पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान कराया है। क्षेत्र के 16 गांवों में अब तक 300 से अधिक पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान कराया जा चुका है। जिला परियोजना प्रबंधक हरीश दुबे ने बताया, देवश्री के माध्यम से भारतीय नस्ल के पशुओं के उत्पादन में वृद्धि करने की कोशिश की जा रही है। गिर, साहीवाल, थारपारकर भारत की परंपरागत पशु गाय की नस्लें हैं, जिनके दूध में ए-2 प्रोटीन पाया जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता में सहायक होता है।

पशु स्वास्थ्य एवं चिकित्सा डॉ. आरपी यादव के मुताबिक कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से देशी पशुओं से ही उन्नत नस्ल के दुधारू पशु प्राप्त होते हैं, जो ग्रामीण परिवेश और वातावरण में आसानी से ढल जाते हैं। इससे किसानों को उनकी देखभाल में अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं उठाना पड़ता।



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