श्री निवास तिवारी ने बढ़ाया था विधानसभा अध्यक्ष का रूतबा
विंध्य की राजनीति में शक्ति केन्द्र के तौर पर उभरने वाले नेताओं की पृष्ठभूमि समाजवादी अथवा गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई की रही है. श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी समाजवादी पृष्ठभूमिक के थे. गिरीश गौतम ने राजनीति की शुरूआत भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से की थी. पेशे से वकील थे. गरीबों के मामले बिना पैसे लड़ते थे. साईकल से अपने क्षेत्र की परिक्रमा करते. उनकी लोकप्रियता पर लोगों का ध्यान वर्ष 1998 में उस वक्त गया जब मनगंवा विधानसभा सीट पर उन्होंने श्रीनिवास तिवारी की जीत केवल 196 वोट पर लाकर टिका दी. इतने कम अंतर के कई किस्से अभी भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई देते हैं. वर्ष 2003 में श्रीनिवास तिवारी गौतम के हाथों 28 हजार वोटों से चुनाव हारे थे. लगातार दस साल तक विधानसभा अध्यक्ष रहने का रिकार्ड श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी के नाम है. श्रीनिवास तिवारी ने ही विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी का रूतबा स्थापित किया था. विंध्य अंचल में उनकी समांतर सरकार चलती थी. अमहिया सरकार के नाम से. श्रीनिवास के प्रभाव के कारण ही विंध्य के लोग ने नारा दिया था-दादा नहीं दउव हैं. अर्थात वे भगवान हैं. सरकार में श्री निवास तिवारी को किसी काम को लेकर ना कहने वाला कोई नहीं था. श्री निवास तिवारी से पहले विंध्य क्षेत्र से गुलशेर अहमद और रामकिशोर शुक्ला विधानसभा अध्यक्ष रह चुके थे. विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच टकराव अस्सी के दशक में हुआ. अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और यज्ञदत्त शर्मा विधानसभा अध्यक्ष.
गौतम की गंभीरता ने कई दावेदारों को पीछे छोड़ा
मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष के तौर पर गिरीश गौतम का चुनाव औपचारिक तौर पर कर लिया गया है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने संख्या बल के कारण अपना उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा. जबकि 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब कांग्रेस सरकार में आई थी तो भाजपा ने अध्यक्ष पद पर अपना उम्मीदवार उतारा था. आदिवासी चेहरा विजय शाह उम्मीदवार थे. जबकि भाजपा के पास भी बहुमत नहीं था. पिछले साल मार्च में कांग्रेस पार्टी के 22 विधायकों के एक साथ पार्टी छोड़ने से राज्य में भाजपा सरकार की वापसी हुई थी. पिछले एक साल से विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव का मामला लगातार टलता जा रहा था. कारण भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति. विंध्य क्षेत्र के कई कद्दावर नेता मंत्री बनने के लिए लॉबिंगकर रहे थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का झुकाव पूर्व मंत्री राजेन्द्र शुक्ला की ओर था. जबकि विंध्य के अन्य नेता शुक्ला के खिलाफ थे. राजेन्द्र शुक्ला का एक दशक तक विंध्य की राजनीति में दबदबा रहा है. विधानसभा अध्यक्ष के पद के एक अन्य सशक्त दावेदार केदार शुक्ला भी थे. 2018 के विधानसभा चुनाव में विंध्य क्षेत्र की 30 में से 26 सीटें भाजपा के खाते में गईं थीं. विंध्य में पिछड़ जाने के कारण ही कांगे्रस स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सकी थी.
असंतुष्टों को साधना अभी भी आसान नहीं
कहा यह भी जा रहा है कि गिरीश गौतम को अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाने में उनकी वामपंथी पृष्ठभूमि ने बहुत मदद की. पृष्ठभूमि का पश्चिम बंगाल के चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है. गौतम के विधानसभा अध्यक्ष बन जाने के बाद विंध्य के नेताओं के बीच मंत्री बनने की दौड़ अभी खत्म नहीं हुई. राजेन्द्र शुक्ला और केदार शुक्ला दोनों ही अपनी-अपनी तरह से कोशिश कर रहे हैं. केदार शुक्ला कहते हैं कि विंध्य को सही प्रतिनिधित्व तब ही मिलेगा,जब कोई मंत्री बनेगा. वहीं दूसरी और नवनियुक्त अध्यक्ष गिरीश गौतम कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता विधायकों के हितों की रक्षा है. वे कहते हैं कि भाजपा ने हमेश विंध्य को प्राथमिकता में रखा है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
दिनेश गुप्ता
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.
First published: February 22, 2021, 1:50 PM IST



