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- Leopard Attack In Madhya Pradesh Indore Case; 11 Month Old Girl Dies In Choithram Trust Hospital
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इंदौर7 मिनट पहलेलेखक: राजीव कुमार तिवारी
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बुआ आरती ने अपनी जान पर खेलकर मासूम भूमिका को तेंदुए से बचाया था।
तेंदुए के हमले में घायल 11 महीने की बच्ची आखिर कार 9 दिन जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद जिंदगी की जंग हार गई। देर रात उसने आखिरी सांस ली। अपनी एकलौती संतान को बचाने के लिए उसके चौकीदार पिता ने क्या-क्या नहीं किया। लोगों से उधारी ली, घर का सामान गिरवी रखा। वन विभाग के पास मदद मांगने पहुंचा। बच्ची को बचाने उसने अपनी क्षमता से आगे बढ़कर कोशिश की, लेकिन बेटी को नहीं बचा सका। परिवार के तीन लोग तेंदुए का शिकार बने थे। तीनों के इलाज में उसके करीब 4 लाख रुपए खर्च हुए हैं। अकेले बेटी के इलाज में ही करीब 3 लाख रुपए का खर्च आया है। वहीं, पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन ने बताया कि तेंदुए के हमले से बच्ची के पेट में गंभीर घाव हो गया था। इस कारण उसे परफोरेशन हो गया। लेप्रोटोमी करने के बाद भी संक्रमण ज्यादा फैलने से उसे बचाया नहीं जा सका। बच्ची के कमजोर होने से वह रिकवर नहीं कर पाई। दैनिक भास्कर ने मासूम के पिता सुनील से बात की तो वे फफक पड़े और अपना दुख और मजबूरी सामने रख दिया।
मां दीपाली की हालत भी ठीक नहीं है। बेटी के गुजर जाने से उसका बुरा हाल है।
क्या हुआ था उस दिन
न्यू रानीबाग के समीप झाबुआ महाराज के फार्म में आया तेंदुआ 11 मार्च को ग्राम लिबोदी की शिवधाम कालोनी में घुस गया। छह वनकर्मी 10 मार्च की रात से खेतों में तेंदुआ की िनगरानी कर रहे थे, टार्च की रोशनी से सर्चिंग कर रहे थे और तेंदुआ खेतों से निकलकर एक निर्माणाधीन घर में घुस गया। यह वही मल्टी है, जिसमें सुनील गाडेकर अपने परिवार के साथ रहता है। सुबह साढ़े 9 बजे करीब मकान में सुनील कुछ काम कर रहा था। भीतर पत्नी दीपाली, बहन आरती और 11 महीने की बेटी भूमिका थे। तेंदुआ घर में घुकर सीधे किचन तक पहुंच गया था। यहां पर सबसे पहले बहन ने तेंदुए काे देखा अाैर उसके हमला करने के पहले झूले में झूल रही बच्ची काे उठाकर भागने की काेशिश की, लेकिन तेंदुए ने उसे दबोच लिया। उसने उसके पीठ पर वार किया। तेंदुए का पंजा मासूम के पेट में भी गुस गया। पत्नी दीपाली शाेर मचाते हुए बेटी काे बचाने दाैड़ते हुए बाहर की ओर भागी तो तेंदुआ उसके पीछे दौड़ पड़ा।
आरती के पीठ पर तेंदुए ने पंजा मारा था।
पिता बीच में नहीं आते तो पत्नी को भी खो देता
सुनील ने बताया कि चीख सुन पति दौड़े और तेंदुए से सामना हो गया। पिता ने तेंदुए को भगाने की कोशिश की तो उन पर हमला कर दिया। पिता यदि एक सेकंड लेट हो जाते तो पत्नी की शायद खो देता। तेंदुआ जब दौड़ा तो पिता ने आकर तेंदुए को पकड़कर फेंका। उस समय से ही वह डरी सहमी है। पिता सुखलाल के हाथ, पैर में तेंदुए ने काट लिया। बहन आरती भी हमले में गंभीर घायल हुई थी। दाेनों का आपरेशन हुआ, जिन्हें बुधवार को डिस्चार्ज कर दिया गया। वहीं, गंभीर रूप से घायल मेरी 11 महीने की बेटी भूमिका की देर रात इलाज के दौरान मौत हो गई।
अस्पताल में 9 दिनों तक मासूम जिंदगी की जंग लड़ती रही।
दूध पीते ही उल्टी हुई, नाक से खून आया
हमले के बाद भूमिका का ऑपरेशन किया गया। चार पांच दिन तो वह ठीक रही, इसके बाद गुुरुवार रात 11 बजे मैडम ने मुझे बुलाया। बच्ची की सांसें जोर-जोर से चल रही थीं। उन्होंने कहा कि बच्ची को बड़ी मशीन पर रखना पड़ेगा। करीब रात 3 बजे उन्होंने कहा कि बच्ची नहीं रही। उन्होंने बताया कि बेटी के आंतों में संक्रमण ज्यादा फैल गया था। तेंदुए के नाखून से आंत में पांच से छह छेद हो गए थे। आंत का ऑपरेशन हुआ था, वह ठीक भी हो रही थी। सोमवार को मैडम ने उसे दूध पिलाया था। कहा था यदि उसे शूट हो गया तो फिर धीरे-धीरे खाना बढ़ाएंगे। दूध पीने के बाद उसका पेट फूलने लगा तो अगले दिन दूध नहीं दिया। गुरुवार को जब फिर से दूध दिया तो उसने उल्टी कर दिया। उसके नाक में लगी नली से खून आने लगा था। उसकी सांसे उखड़ने लगीं और फेफड़ों में खून फैल गया। इसके बाद उसे आईसीयू में फिर से भर्ती करने का कहा गया था। मैडम ने बताया था कि उसे हाई लेवल का इंफेक्शन हुआ था। उसके प्लेटलेट्स सिर्फ 4 हजार बचे थे।
पिता ने बेटी को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे उसे बचा नहीं पाए।
मल्टी के मालिक ने 65 हजार रुपए दिए
उन्होंने बताया कि इलाज में करीब चार लाख रुपए का खर्च आया है। वन विभाग ने 2 लाख 15 हजार रुपए दिए थे, लेकिन उससे ज्यादा अस्पताल का बिल बना है। अकेले बेटी के इलाज में ही ढाई से तीन लाख रुपए का खर्च आया है। जिस दिन बेटी को भर्ती करवाने आए। अस्पताल वालों ने कहा कि 30 हजार रुपए जमा कर दो। इस पर हमारे मल्टी के मालिक ने रुपए जमा करे। इसके बाद उन्होंने करीब 32 हजार रुपए की तुरंत दवाई लाई। इस प्रकार उन्होंने पहले दिन 65 हजार रुपए इलाज के लिए खर्च किए। 32 हजार रुपए का एक वैक्सीन लगा था। बेटी के साथ ही बहन और पिता के लिए प्रतिदिन दवाई लाना पड़ रही थी। इस प्रकार हर दिन 8 से 10 हजार रुपए की दवाई खरीदना पड़ रहा था। गुरुवार शाम को पिता और बहन को डिस्चार्ज कर दिया था।
मासूम के पेट और चेहरे पर गंभीर घाव थे।
चाचा, मामा, बाबा… सबसे इलाज के लिए मदद मांगी
बेटी भूमिका बुधवार तक ठीक थी। वह देख रही थी, रो रही थी…। गुरुवार को अचानक तबीयत खराब हो गई। बेटी के जाने के बाद रो-रोकर बुरा हाल है। मल्टी मालिक ने ही हमारी शुरुआत में मदद की। हमारे पास तो रुपए थे ही नहीं। इसके बाद काका, मामा, चाचा, बाबा… हर किसी से बच्ची के इलाज के लिए रुपए मांगे। अपनी क्षमता अनुसार सभी ने मदद की, उन्हीं रुपयों से इलाज करवा रहे थे। चार दिन पहले वन विभाग ने 2 लाख 15 हजार रुपए दिए। इसमें से एक लाख रुपए अस्पताल में जमा किए। बाकी के रुपए दवाईयों के िलए बचा लिया। अस्पतालवालों को आज-कल का कहते रहे। उन्होंने फिर से रुपए मांगे तो एक लाख रुपए और जमा किए। अभी भी अस्पतालवालों का करीब 1 लाख रुपए का बिल बकाया है। फारेस्ट वाले आए थे बोले हैं कि सभी बिल हमें दे देना, हम रुपए दिलवाएंगे।
सुनील के पिता सुखलाल को भी हमले में गहरे घाव आए हैं।
18 अप्रैल काे जन्मदिन भागवानपुरा में मनाने वाले थे
सुनील मूलत: खरगाेन के भगवानपुरा का रहने वाला है। बेटी भूमिका 18 अप्रैल काे एक साल की हाेने वाली थी। इसलिए वे गांव में उसका जन्मदिन मनाने का प्लान कर रहे थे। उन्हें क्या पता था कि महाशिवरात्रि के दिन ऐसा हाे जाएगा। सुनील ने बताया कि काम की तलाश में वह करीब 10 साल पहले इंदाैर आ गया था। तब से ही वह चाैकीदारी का काम कर रहा है। उसके पिता भी काम में हाथ बंटाते हैं।