नहीं रहे बटुक दादा: बटुक दादा ने स्वयं भी कलम पकड़ी, असंख्यों को कलम पकड़ाई भी; और उस कलम में अपने सौहार्द की स्याही भी भरी

नहीं रहे बटुक दादा: बटुक दादा ने स्वयं भी कलम पकड़ी, असंख्यों को कलम पकड़ाई भी; और उस कलम में अपने सौहार्द की स्याही भी भरी


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डॉ सुमन चौरे। भोपाल19 मिनट पहले

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नहीं रहे बटुक दादा।

मध्यप्रदेश लेखक संघ के माध्यम से दादा की यह वट जटायें गांव-गांव, गली-गली तक पहुंची। उन्होंने इस अखण्ड वट में उच्च स्तरीय क्लिष्ट हिन्दी भाषा से लेकर ठेठ बोलियों तक सभी को समाहित किया। इस वट वृक्ष पर कीर्तिमान साहित्यविद् तो स्थापित रहे ही, उसकी छाँव में नन्हे-नन्हे, छोटे-अदने पंख पखेरू भी रहकर अपने को सदा निर्भय अनुभव करते रहे और वे उसे अपना आशियाना मानते रहे। लेखक का विचार, उसकी अपनी सम्पत्ति होती है, किन्तु वह कलम से कागज पर उतरते या कंठ से श्रव्य तक पहुंचते ही समाज की सम्पत्ति हो जाती है। जब तक किसी ने उसे वाचा नहीं, तो वह लेखन कोरा रह जाता है, या वह विचार किसी ने सुना नहीं, तो वह विचार खाली ही रह जाता है। इसलिए बटुक दादा ने पढ़ने सुनने के लिए जो लेखक मंच सुस्थापित किया और उसकी तासीर ऐसी बना दी कि हल्का-भारी, नीचा-ऊंचा, छोटा-बड़ा आत्मविश्वासी होकर यहां ऐसा खड़ा होता, मानों उच्च शिखर पर खड़ा हो। उन्होंने सबके लिए एक माकूल मंच बना दिया।

उनका एक ही मंत्र था- लिखने से पहले खूब पढ़ो
बटुक दादा नए रचनाकारों को उनकी कमियाँ ही नहीं बताते थे वरना कमजोर कड़ियों को मज़बूत बनाने की कला भी सिखाते थे। वे एक गुरु की तरह गुरुत्त्व के धनी भी थे, और वे ‘भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट’को चरितार्थ भी करते थे। अपनी कलम से दादा ने हिन्दी साहित्य को तो समृद्ध किया ही और हिन्दी भाषा के साथ बोलियों की ओर नई पीढ़ी को उत्प्रेरित भी किया। उनका कहना रहा, “लिखो-लिखो-लिखो और खूब लिखो किन्तु लिखने से पहले पढ़ो-पढ़ो-पढ़ो और खूब पढ़ो।” दादा मध्यप्रदेश लेखक संघ की हर मासिक गोष्ठी में इस प्रवृत्ति पर अफ़सोस ज़ाहिर करते थे, कि अबकी नई पीढ़ी सिर्फ लिखती है, और पढ़ना उसे अरुचिकर लगता है। लेखक संघ की प्रत्येक मासिक गोष्ठी में वे उस गोष्ठी के विषय के विशेषज्ञ को आमंत्रित कर रचनाकारों का उत्साहवर्धन कर और कमियों को दूर कर, पठन और लेखन में निपुणता लाने को वे केंद्र में रखते थे। एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात उनके साथ यह चरितार्थ रही कि उनके अध्यक्षीय काल में उन्होंने अपना समूचा उत्तरदायित्व अपनी आत्मा से निभाकर, ‘मुखिया मुख सो चाहिए’को चरितार्थ किया।

…बेटी हो, चरण स्पर्श क्यों करती हो
कोई व्यक्ति संस्था कैसे बन जाता है, इसके लिए दादा बटुकजी चतुर्वेदी का संपूर्ण जीवन एक श्रेष्ठ उदाहरण है। दादा को मैं भाई, चतुर्वेदी जी और दादा, इन तीन रिश्तों से जानती आई हूं। मेरे दादा पं. रामनारायणजी उपाध्याय का बटुक दादा से बहुत पुराना संबंध था। जब बटुक दादा मध्यप्रदेश लेखक संघ से नहीं जुड़े थे, तब से, मेरे दादा खण्डवा से जब भी भोपाल आते थे, तो सभी साहित्यकारों से मिलते थे। उन्हीं के मुंह से मैंने कई बार ‘बटुक भाई’ के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व की खूब प्रशंसा सुनी। करीब तीन दशक पहले मैं ‘ बटुक दादा’ की संस्था से दादा के नाम से जुड़ी। मैं जब भी उनको प्रणाम करती थी, वे कहते थे, “तुम बेटी हो, चरण स्पर्श क्यों करती हो।” मेरे आग्रह पर सदैव वे मेरे सिर पर हाथ रखकर अन्तर्मन से आशीर्वाद देते थे। अब मुझे आशीर्वाद देने वालों में से एक कड़ी और टूट गई।

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