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- Can The Willow Be Replaced By Bamboo To Manufacture Cricket Bats? UK Researchers Says Idea Worth Exploring
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लंदन8 मिनट पहले
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विलो की लकड़ी इंग्लैंड और कश्मीर में ही सबसे ज्यादा पाई जाती है। बैट बनाने वाली कंपनियां यहीं से लकड़ी मंगवाती हैं।
क्रिकेट के बैट बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंग्लिश विलो लकड़ी का ऑप्शन मिल गया है। इंग्लैंड के शोधकर्ताओं का दावा है कि बांस के बने बैट विलो को अच्छी टक्कर दे सकते हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि विलो के मुकाबले बांस के बैट का स्वीट स्पॉट कहीं बेहतर है। स्वीट स्पॉट यानी वह जगह, जहां बॉल लगने के बाद स्पीड से दूर जाती है। इससे बड़े शॉट लगाने में आसानी होगी। इसके साथ ही यॉर्कर पर भी बल्लेबाज आसानी से चौका लगा सकेंगे। विलो की लकड़ी इंग्लैंड और कश्मीर में सबसे ज्यादा पाई जाती है।
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में बैट पर शोध किया गया
यह शोध कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के डॉ. दर्शिल शाह और बेन टिंकलर डेविस ने की। इसके मुताबिक विलो के मुकाबले बांस सस्ता और 22% अधिक कड़ा है। ऐसे में गेंद बल्ले पर लगने के बाद कहीं ज्यादा तेज गति से बाउंड्री की ओर जाएगी। कैंब्रिज सेंटर फॉर नेचुरल मैटीरियल इनोवेशन के डॉ. दर्शिल ने कहा- बांस के बैट से यॉर्कर पर चौके लगाना कहीं आसान है। हालांकि, हमने रिसर्च में पाया कि विलो के मुकाबले बांस के बैट सभी प्रकार के स्ट्रोक के लिए बेस्ट है।
अभी विलो की लकड़ी से बैट बनाए जाते हैं। ये लकड़ी ज्यादातर इंग्लैंड और कश्मीर में पाई जाती है।
विलो के मुकाबले आसानी से मिलते हैं बांस
डॉ. दर्शिल का कहना है कि विलो के पेड़ को बड़े होने में 15 साल लग जाते हैं, इसलिए यह आसानी से नहीं मिल पाता है। बैट बनाते वक्त भी 15 से 30% लकड़ी वेस्ट हो जाती है। वहीं, बांस एक सस्ता, आसानी से मिलने वाला और तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है। यह पेड़ 7 साल में बड़े हो जाते हैं। बांस के बैट क्रिकेट डेवलपिंग नेशन जैसे कि चीन, जापान, साउथ अमेरिका में काफी पॉपुलर हैं। डॉ. दर्शिल खुद एक अंडर-19 क्रिकेटर रह चुके हैं।
विलो बैट की तुलना में बांस के बैट अधिक भारी
स्पोर्ट्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में छपे आर्टिकल के मुताबिक, विलो के बैट की तुलना में बांस के बैट अधिक भारी होते हैं। दर्शिल कहते हैं कि बैट के भारीपन को लेकर काम किया जा रहा है। हांलाकि, शॉट लगाते वक्त विलो और बांस के बैट में एक समान वाइब्रेशन पाया गया। यानी दोनों में एक ही स्पीड पर बॉल लगने की तीव्रता एक जैसी थी।
दर्शिल का कहना है कि इंटरनेशनल मार्केट में इसके इस्तेमाल को लेकर अभी कोई चर्चा नहीं है। क्योंकि ICC के नियम के मुताबिक सिर्फ लकड़ी के बने बैट का ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
कश्मीर में बैट बनाता कारीगर।
अभी कैसे बनता है क्रिकेट बैट?
क्रिकेट का बल्ला विलो की लकड़ी से बनाया जाता है। इस पेड़ का वैज्ञानिक नाम सैलिक्स ऐल्बा है। विलो के पेड़ इंग्लैंड के ऐसेक्स इलाके में पाए जाते हैं। भारत में कश्मीर में इसकी संख्या ज्यादा है। भारत में मिलने वाले बैट ज्यादातर कश्मीर से ही बनकर आते हैं।
बैट बनाने के लिए जब विलो की लकड़ी को काटा जाता है, तो इसका वजन 10 किलो के आसपास का होता है। पर सीजनिंग के बाद यह केवल 1 किलो 200 ग्राम रह जाता है। उसके बाद बैट को एक खास मशीन से दबाया जाता है, जिससे उसका खेलने वाला हिस्सा मजबूत बन सके। बैट पर अलसी का तेल लगाने से यह और मजबूत हो जाता है।
ICC के नियम के मुताबिक बैट की लंबाई 38 इंच (965 mm) से ज्यादा और चौड़ाई 4.25 इंच (108mm) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जबकि बैट का वजन 2 से लेकर 3 पौंड (1.2 किलो से 1.4 किलो) तक ही होना चाहिए।
ये कश्मीरी विलो की लकड़ी है। कई देशों में इसी से बने बल्ले का इस्तेमाल किया जाता है।
किस तरह बनता है बांस का बैट?
19वीं सदी में क्रिकेट बैट बनाने के लिए कई तरह की लकड़ियों का प्रयोग किया गया। लेकिन, 1890 से सैलिक्स अल्बा की सैपवुड से इसे बनाया जाने लगा। ये हल्के रंग की लकड़ी थी। ये काफी सख्त होती थी, पर सघनता में कम होती थी यानी वजन कम था।
क्रिकेट में बेंत का इस्तेमाल केवल बैट के हैंडल और पैड्स तक ही सीमित रहा था। बैट बनाने वाले गेरार्ड और फ्लैक ने लोकल्स के साथ मिलकर बांस का बैट का प्रोटोटाइप तैयार किया है। इसमें बांस को 2.5 मीटर लंबे हिस्से में अलग कर प्लेन किया गया। इसके बाद घास, गोंद का इस्तेमाल कर ठोस तख्ता तैयार किया गया। इसके बाद ये अलग-अलग साइज में काटने के लिए तैयार थे।
ये काफी मेहनत वाला काम लग रहा है, लेकिन इसमें वो रोलिंग नहीं करनी होती है, जो कि लकड़ी को सख्त करने के लिए की जाती है। जब नॉकिंग के बाद दोनों तरह के बैटों की क्षमता को मापा गया तो पता चला कि बांस के बने बैट में 5 घंटे नॉकिंग करने से ही उसकी सतह अन्य बैट (प्रेस्ड बैट) के मुकाबले दोगुनी बढ़ जाती है।
बांस के पेड़ से बने बैट विलो के मुकाबले ज्यादा भारी होते हैं। हालांकि, उनमें शॉट क्वालिटी विलो से बेहतर है।
क्रिकेट के बल्ले में कब-कब हुआ बदलाव ?
- मौजूदा समय में जिस तरह के बैट हैं। पहले वैसे नहीं होते थे। 18वीं सदी का बैट हॉकी स्टिक जैसा होता था। 1729 में बना बैट आज भी लंदन के ओवल के म्यूजियम में मौजूद है।
- 1979 में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर डेनिस लिली ने एल्यूमीनियम से बने बैट का इस्तेमाल किया। हालांकि, भारी होने के कारण इससे बॉल को नुकसान पहुंच रहा था। इंग्लिश खिलाड़यों ने अंपायर से इसकी शिकायत की। इसके बाद से ही ICC ने क्रिकेट के नियम में बदलाव किए। इसमें यह निर्धारित किया गया कि बैट का ब्लेड केवल लकड़ी का ही बना होना चाहिए।
- 2005 में कूकाबुरा ने एक नए तरह का बैट जारी किया। इसमें कार्बन फाइबर पॉलिमर की मदद से ब्लेड को सपोर्ट दिया गया। इससे बैट लंबे समय तक चल सकता है। ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग ने सबसे पहले इस बैट का इस्तेमाल किया। हालांकि, बाद में MCC के सलाह पर इसको भी बंद कर दिया गया।
- 2008 में ग्रे निकोल्स ने दो तरफा बल्ले का इस्तेमाल किया। हालांकि, ये बैट कामयाब नहीं हो सका और जल्द ही बनना बंद हो गया।
- 2010 के IPL में बल्ला बनाने वाली एक नई कंपनी मंगूस ने एक नए तरह के डिजाइन वाला क्रिकेट बैट दिया। इस बैट का ब्लेड छोटा और मोटा था। साथ ही हैंडल लंबा था, ताकि इससे बॉल को हिट करने में आसानी हो।
- इस बैट का इस्तेमाल एंड्रयू साइमंड्स, मैथ्यू हेडन, स्टुअर्ट लॉ और ड्वेन स्मिथ जैसे प्लेयर्स ने भी किया। पर शॉर्ट बॉल को इस बैट से खेलने में सक्षम नहीं होने के कारण मंगूस बैट सक्सेसफुल नहीं रहा।