भोपाल34 मिनट पहले
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पटेल ने बताया कि तीन साल पहले नंदिनी दस्तक बाल समूह की सदस्य बनी थी। इस समूह में बच्चों को पढ़ाई के महत्व के बारे में बताते हुए उन्हें स्कूल से जोड़ने का काम किया जाता है।
- गोंड आदिवासी बहुल इस छोटे से गांव में शिक्षा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ एक प्राइमरी स्कूल है, लॉकडाउन के बाद से वह भी बंद है
- नंदिनी खुद दूसरे गांव में मौजूद मिडिल स्कूल में कक्षा-8 की छात्रा है और अपने गांव के 25 बच्चों को समूह बनाकर बारी-बारी से उनकी कक्षा लगा रही है
(हरेकृष्ण दुबोलिया) कोविड-19 महामारी से उपजी अव्यवस्थाओं और जंगलों के बीच बसे मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के धनोजा गांव के भटिया टोला से एक उम्मीद जगाती कहानी सामने आई है। गोंड आदिवासी बहुल इस छोटे से गांव में शिक्षा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ एक प्राइमरी स्कूल है। लॉकडाउन के बाद से वह भी बंद है। उम्मीद थी कि जुलाई में स्कूल खुल जाएगा, लेकिन नहीं खुला। इसके बाद गांव की बेटी 14 साल की नंदिनी ने खुद बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया और बच्चों की कक्षा लगाना शुरू कर दिया।
नंदिनी खुद दूसरे गांव में मौजूद मिडिल स्कूल में कक्षा-8 की छात्रा है और अपने गांव के 25 बच्चों को समूह बनाकर बारी-बारी से उनकी कक्षा लगा रही है।नंदिनी ने देखा कि स्कूल बंद होने से गांव के बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे हैं। बच्चे दिनभर गली में घूमते ओर खेलते रहते हैं। नंदिनी ने टोले के बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने पिता सुरेश गोंड से बात की, उन्होंने कहा ठीक है पढ़ाओ। गांव वाले भी इसके लिए तैयार हो गए। इसके बाद नंदिनी ने 5 जुलाई से बच्चों को अपने घर के बाहर पढ़ाना शुरू कर दिया। पृथ्वी ट्रस्ट से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता छत्रसाल पटेल जब इस गांव में पहुंचे तो उन्हें यह स्कूल चलता हुआ मिला। उन्हीं के जरिए यह जानकारी विकास संवाद को भी मिली।
तीन साल पहले बनी थी दस्तक समूह की सदस्य
पटेल ने बताया कि तीन साल पहले नंदिनी दस्तक बाल समूह की सदस्य बनी थी। इस समूह में बच्चों को पढ़ाई के महत्व के बारे में बताते हुए उन्हें स्कूल से जोड़ने का काम किया जाता है। दस्तक बाल समूह विकास संवाद और पृथ्वी ट्रस्ट की एक परियोजना का हिस्सा है।
मप्र में 65034 सरकारी प्राइमरी स्कूल
कोविड-19 से फैली महामारी से बच्चों की पढ़ाई दुनियाभर में प्रभावित हो रही है। विश्वभर में कॉस्मोपॉलिटन और मेट्रोपॉलिटन शहरों से लेकर मप्र के सुदूर आदिवासी अंचल के गांवों तक में बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। मप्र में कुल 65034 प्राइमरी स्कूल हैं, इनमें 60 फीसदी स्कूल ग्रामीण इलाकों में हैं।
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