एमपी के चुनावी नतीजे सिर्फ राज्य ही नहीं, कई बड़े नेताओं का भविष्य भी करेंगे तय

एमपी के चुनावी नतीजे सिर्फ राज्य ही नहीं, कई बड़े नेताओं का भविष्य भी करेंगे तय


इस चुनाव के औचित्य को लेकर जितने भी दावे नेताओं ने किए, उसे वोटरों ने कैसे समझा? क्या उसी भाषा में समझा, जिस भाषा में उसे राजनेताओं ने रटाया? संभवतः ऐसा नहीं है. वज़ह है वोटिंग प्रतिशत.

Source: News18Hindi
Last updated on: November 9, 2020, 6:16 PM IST

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एमपी की 28 विधानसभा सीटों के नतीजे मंगलवार को आ रहे हैं. ये सामान्य चुनाव नहीं है, बल्कि आम चुनावों से ज्यादा असामान्य है. असामान्य इस लिहाज़ से कि ये चुनाव विधानसभा को सिर्फ 28 नए विधायक नहीं देंगे बल्कि ये चुनाव तय करेंगे कि एमपी की सियासत में कौन से बड़े नेता का राजनैतिक भविष्य क्या है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की भावी भूमिका भी इन्हीं चुनावों के आधार पर लिखी जाएगी. कांग्रेस छोड़कर गए करीब 26 विधायकों सहित दो विधायकों के निधन से खाली ये सीटें सूबे का सियासी भविष्य भी तय कर देंगी.

नेताओं के दावे बनाम वोटरों की समझ

सबसे पहले देखते हैं कि इस चुनाव के औचित्य को लेकर जितने भी दावे नेताओं ने किए, उसे वोटरों ने कैसे समझा? क्या उसी भाषा में समझा, जिस भाषा में उसे राजनेताओं ने रटाया? संभवतः ऐसा नहीं है. वज़ह है वोटिंग प्रतिशत. जिन 28 सीटों के नतीजे मंगलवार को आ रहे हैं, उनमें पिछली बार यानी 2018 के चुनावों में वोटिंग का प्रतिशत 72.90 था. इस बार इन्हीं जगहों का वोटिंग प्रतिशत है 70.27. यानी कोरोना को लेकर एहतियात, संशय, भ्रम और कुछ हद तक खौफ़ भी वोटर के उत्साह के आगे बौना साबित हुआ. वोटर घरों से निकला तो मन बनाकर निकला है. ये मन किसके लिए मनभावन होगा, यह तो मंगलवार देर शाम तक स्पष्ट होगा. लेकिन इतना ज़रूर है कि वोटर मुखर था, मौन नहीं.

बात मध्य प्रदेश के तीन दिग्गजों की

अब बात करेंगे कि ये चुनाव कैसे शिवराज, सिंधिया और कमलनाथ की सियासी तक़दीर लिखने वाले साबित होंगे. दरअसल भाजपा ने इस बार भी अपने पूरे इलेक्शन कैम्पेन को शिवराज बनाम कमलनाथ रखने की कोशिश की. भाजपा कतई नहीं चाहती थी कि चुनाव सिंधिया बनाम कमलनाथ हो. उसके अलग-अलग तरह के पूर्वाग्रह इसके पीछे थे. पहला तो यह कि वो सिंधिया को प्रदेश भाजपा का सर्वमान्य चेहरे के तौर पर प्रतिपादित नहीं करना चाहती थी. दूसरा, वो पार्टी को उस गुस्से की (यदि कल वोट के नतीजों की शक्ल में झलका तो) आग से बचाना चाहती थी, जो दल-बदल और बिकाऊ के तौर पर भाजपा को झुलसा सकती थी. इस आम चुनाव की सबसे बड़ी वज़ह सिंधिया भाजपा में आए तो 22 विधायकों के साथ ही, लेकिन उनके असल में लोग थे मात्र 18 या 19. बाकी तो कांग्रेस से नाराज़ होकर और मंत्री न बनाए जाने की पीड़ा के साथ चलती गाड़ी में सिर्फ सवार हुए थे, बिना इस बात की परवाह किए कि इस गाड़ी को ड्राइव कौन कर रहा है.

पार्टी की कसौटी पर कसे जाएंगे नेता

तो परखे जाएंगे शिवराज भी कि कितने बड़े जननेता हैं वे अब तक. सभी जगह भाजपा प्रत्याशियों के गारंटर के तौर पर शिवराज ने खुद को ही प्रस्तुत किया है. परखे जाएंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी, जो पार्टी छोड़ने से लेकर वोटिंग तक ये साबित करते रहे कि पिछली कांग्रेस सरकार उन्हीं के जनाधार के कारण बनी है. आंके जाएंगे कमलनाथ भी कि दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व को भाव न देने वाले कमलनाथ क्या एमपी में कांग्रेस का विकल्प बने रहने के लायक़ बचे भी हैं या नहीं.नंबर गेम के निकष पर

नम्बर गेम के मुताबिक़, भाजपा को ज्यादा बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं करना है. लगातार विपक्षी विधायकों को इस्तीफ़ा दिला रही भाजपा ने ऐन चुनाव के वक़्त दमोह से कांग्रेस विधायक का इस्तीफा करवा कर और उसे भाजपा ज्वॉइन इसी वज़ह से करवाया क्यूंकि अब मैजिक फिगर सरक का 115 पर आ गया है. इसके मुताबिक़ भाजपा को सिर्फ 8 विधायकों की दरकार है, जबकि कांग्रेस को चाहिए पूरे 28. भाजपा सरकार बचाने में भले ही कामयाब हो जाए लेकिन इसका आकलन गणितीय तरीके से पार्टी करेगी. क्या सिंधिया ग्वालियर चंबल के 16 विधायकों सहित पूरे 19 विधायक जितवा पाते हैं, इसे भी उनकी क्षमता से जोड़कर देखा जाएगा. शिवराज की आम लोगों के बीच ग्राह्यता देखी जाएगी. कमलनाथ कितने बड़े प्रबंधक हैं ये उनकी पार्टी देखेगी. इन्हीं नतीजों के आधार पर पारितोषक या दंड दोनों ही प्रमुख दल निर्धारित करेंगे. तो कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ये चुनाव विधायकों से ज्यादा उन बड़े नेताओं का भविष्य तय करेगा जो इस चुनावी रथ के सारथी थे. [/readtext]


First published: November 9, 2020, 6:04 PM IST





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