एमपी के शहडोल में आठ बच्चों की मौत: असरकारी प्रयासों के बारें में सोचिए सरकार

एमपी के शहडोल में आठ बच्चों की मौत: असरकारी प्रयासों के बारें में सोचिए सरकार


कुपोषण से बच्चों की मौत के मामले में देश में अव्वल मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल की शिशु गहन चिकित्सा इकाई में 48 घंटों में 8 बच्चों की मौत हो गई. जनवरी 2020 में भी इसी अस्पताल में एक साथ 8 बच्चों की मौत हुई थी. तब भी बच्चों की मौत के बाद सरकार ने सख्त कदम उठाने की बात कही थी, इस बार भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आपात बैठक बुला कर हिदायतें दी हैं. तब कांग्रेस की सरकार थी और अब भाजपा की सरकार है. कुपोषण से बच्चों की मौत का मामला एक दिन या एक सरकार का मामला नहीं है. कई दशकों में सरकारें बदली हैं, मुख्यमंत्री बदले हैं; मगर नहीं बदला तो तंत्र के काम करने का तरीका और कुपोषण से बच्चों की मौत का सिलसिला.

शहडोल के जिला अस्पताल में बच्चों की मौत चिंता का सबब है क्योंकि इन बच्चों की मौत सामान्य स्थितियों में नहीं बल्कि कुपोषित बच्चों की देखभाल करने के लिए विशेष तौर पर बनाई गई गहन चिकित्सा इकाई में हुई हैं. सरकारी तंत्र के पास इन मौत के लिए फौरी जवाब है कि बच्चों की स्थिति गंभीर थी और उन्हें बचा पाना मुश्किल था. कहने को तो यह बात सच भी है. गंभीर स्थिति में कहीं भी बच्चों को बचाना संभव नहीं होता है. मगर शहडोल जैसे आदिवासी जिले में बच्चों की हालत गंभीर क्यों हुई और हुई तो इस स्थिति को संभालने के प्रयास क्यों नहीं हुए, जैसे सवालों पर प्रशासन योजनाओं और अपने अभियानों को गिनाने लगता है.

इन अभियानों का क्या हश्र हुआ है,यह जानकारी खुद सरकार के आंकड़ें ही दे रहे हैं. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस के 2019के बुलेटिन के अनुसार मध्यप्रदेश में जन्म लेने वाले प्रत्येक 1000 में से47 बच्चों की कुपोषण के कारण मौत हो जाती है. मध्य प्रदेश में कुपोषण से बच्चों की मौत के मामले में देश में पहली पायदान पर है.बच्चों और महिलाओं की सेहत की फिक्र करने वाले महिला एवं बाल विकास विभाग ने वर्ष 2017 से लेकर 2019 तक 10 लाख से ज्यादा बच्चे कम और अति कम वजन वाले दर्ज किए हैं। विभाग का अमला कोरोना संक्रमण से निपटने में लगा है और इस कारण विभाग नेअपने पोर्टल पर 2020 के कुपोषण के आंकड़ें दर्ज नहीं किए हैं. समझा जा सकता है कि जब विभाग ने आंकड़ें दर्ज नहीं किए हैं तो मैदानी हालत क्या होगी? मैदानी हकीकत का अंदाजा ‘द लैंसेट’ ने 12 मई2020 को प्रकाशित अध्ययन में लगाया है.

जॉन हॉप्किंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (अमेरिका) द्वारा किए इस अध्ययन के मुताबिक कोविड-19 के कारण जिस तरह से मातृत्व और बाल स्वास्थ्य-पोषण सेवाओं में रुकावट आई है, उससे पूरी दुनिया में छह महीनों में 11.57 लाख बच्चों और 56,700 मातृत्व मृत्यु होने की आशंका है. अध्ययन के अनुसार विश्व के कुल कुपोषित बच्चों में 21प्रतिशत बच्चे भारत के हैं, जो अब बढ़कर 31.5 प्रतिशत हो सकते हैं.यह अध्ययन कहता है कि छह महीनों में भारत में कुपोषण और बीमारियों के कारण 3 लाख बच्चों की मृत्यु और 14,388 महिलाओं की मातृत्व मृत्यु हो सकती है. कोरोना काल में देश में मातृत्व स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकों के उपयोग में भी बहुत कमी आई है. बाल मृत्यु दर को कम करने में टीकाकरण महत्वपूर्ण है. मैदानी अमले के कोरोना ड्यूटी में रहने या काम न करने के कारण टीकाकरण दर भी तेजी से गिरने की आशंका जताई गई थी. अध्ययन ने कहा है कि संदर्भ में बीसीजी की टीकाकरण 92% से44.2%, पोलियो का 89% से कम होकर 42.8%, डीपीटी 89% से घटकर 42.8%और हेपेटाईटिस का89% से गिर कर 42.8% पर आ सकता है.

शहडोल में बच्चों की मौत उदाहरण है कि वैश्विक अध्ययन ने जो आशंका जताई है वह मैदान में साफ दिखाई दे रही है. ऐसा नहीं है कि शहडोल में हो रही बच्चों की ये मौत आकस्मिक है. असल में पूरे प्रदेश में कुपोषण से बच्चों की मौत के कारणों की एक श्रृंखला है. इस दिशा में काम कर रहे भोजन का अधिकार समूह के सचिन जैन बीसियों बार बता चुके हैं कि बच्चों की सेहत सुधारनी है तो माता की सेहत और उससे भी पहले किशोरी की सेहत, बाल विवाह, रक्ताल्पता यानि एनीमिया आदि पर ध्यान देना होगा. किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के मुद्दों और समस्याओं को अलग-अलग मानने की जगह एक श्रृंखला के रूप में देखना होगा. इस अनुभव के बरअक्स जब हम मैदान में देखते हैं तो पाते हैं कि किशोरों,महिलाओं और बच्चों को अलग-अलग कर देखना योजना निर्माण की बड़ी चूक है. सरकार पैसा लूटा रही है और अमला खानापूर्ति कर रहा है. महिला एवं बाल विकास विभाग,स्वास्थ्य विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग मिल कर भी योजनाओं का क्रियान्वयन ठीक से नहीं कर पा रहे हैं. हर दो-पांच साल में सरकार आंगनवाड़ी में अंडा वितरण के निर्णय पर राजनीति को गर्माती है और अपना वोट बैंक लाभ कमा कर बच्चों की सेहत के मुद्दे को पीछे धकेल देती है.

शहडोल को नजीर मानें तो हकीकत यह है कि बच्चों के कुपोषित होने के बाद भी पोषण पुनर्वास केंद्र के बेड खाली रहते हैं. भरपूर अमला होने के बाद भी शहडोल के जिला अस्पताल की एनआरसी में 480 बच्चों को भर्ती करवाने के लक्ष्य को पिछले कुछ सालों में पूरा नहीं किया जा सका है. सवाल यह है कि जब हर जिले के अस्पतालों में बच्चों की देखभाल के लिए जबकि विशेष यूनिट तैयार है, बच्चों को यहां रखने के लिए परिवार को पैसा दिया जाता है ताकि मजदूरी का हर्जा न हो,आंगनवाड़ी में पोषण आहार दिया जा रहा है, महिलाओं की सेहत पर ध्यान देने के लिए सरकार रात-दिन एक किए हुए है तो फिर कमी क्या है? कमी है इच्छाशक्ति की। मैदान पर असर के लिए बजट से अधिक ईमानदार प्रयासों की जरूरत है. देखा गया है कि कुपोषण मिटाने का जिम्मा जिस मैदानी अमले को दिया गया है वह न तो अपना काम ठीक से कर रहा है और न ही उनकी निगरानी करने वाले अधिकारी अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभा रहे हैं.जबकि गैर सरकारी संगठन अधिक नियोजित ढंग से काम कर बेहतर उदाहरण पेश कर रहे हैं. प्रदेश में चला ‘दस्तक अभियान’ ऐसी ही एक नजीर है. दस्तक अभियान चार जिलों में पांच संगठनों की पहल है जिसके तहत उन्होंने समुदाय को साथ लेकर कुपोषण को मात देने के लिए कई तरह के नवाचार किए. ये प्रयास वास्तव में उन आदतों और समस्या ओं को बदलने का उपक्रम हैं जिन पर सरकार का ध्यान अमूमन नहीं जाता.

भोपाल के स्वयंसेवी संगठन विकास संवाद के साथ उमरिया में जैनिथ यूथ सोसायटी, रीवा में रेवांचल दलित अधिकार मंच, पन्ना में पृथ्वी ट्रस्ट और सतना में आदिवासी अधिकार मंच ने मिल कर कर 2015 में दस्तक अभियान आरंभ किया था. ये वे जिले हैं जहां कुपोषण तमाम प्रयासों के बाद भी बच्चों की जान ले रहा है. इन संगठनों के केवल आईसीडीएस सेवाओं, आंगनवाड़ी व स्वास्थ्य प्रणाली को ही सशक्त करने में सहयोग नहीं किया बल्कि ग्रामीण जीवन के उन छोटे-छोटे कारणों को भी टटोला जिनके कारण बच्चों को पोषण नहीं मिल पाता. जैसे, बच्चे पोषित तो तब हों जब उन्हें पौष्टिक आहार मिले. इन जिलों में अध्ययन कर संगठनों ने पाया कि ग्रामीण परिवारों के यहां केवल 2 माह ही सब्जी उपलब्ध होती है. इस समस्या का समाधान करने के लिए 4 हजार से अधिक परिवारों के यहां किचन गार्डन विकसित करवाए गए. यह जानकार आश्चर्य होगा कि बीते तीन सालों में इन परिवारों ने करीब 90 लाख मूल्य की सब्जियां अपने किचन गार्डन में उगाई है. उनके बच्चों को अब 2 माह नहीं बल्कि 6से 8 माह तक घर में उगी सब्जी खाने को मिलती है.इसी तरह, दस्तक अभियान ने पाया कि पेयजल बड़ी समस्या है. साफ पानी न होने से बच्चे बीमार पड़ते हैं. फसलों को सिंचाई का पानी नहीं मिलता. जनता को ही साथ लेकर क्षेत्र में 160 से अधिक जल संरचनाएं बनाई गईं. छोटे किसानों को बीज दिए गए. उन्हें जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया. इन प्रयासों का परिणाम क्या हुआ? ये संगठन रीवा, पन्ना, उमरिया और सतना के करीब 731 बच्चों को गंभीर कुपोषित होने और उनकी जान बचाने में कामयाब हुए थे. भारत में कुपोषण खत्म करने के लिए समुदाय की भूमिका बढ़ाने की स्वप्निल बातों के आगे यह कदम उदाहरण है कि कुपोषण के तात्कालिक और मूल कारणों जैसे माता-पिता के रोजगार, लैंगिक असमानता, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि पर ध्यान देना आवश्यक है.

ये प्रयास सरकारी तंत्र के लिए मॉडल की तरह है कि गंभीर कुपोषित बच्चों को इलाज और पौष्टिक आहार देने जितना ही जरूरी है कि कम या मध्यम कुपोषित बच्चों को टारगेट कर उन्हें गंभीर कुपोषित होने से बचाया जाए. जन भागीदारी ऐसे अभियान को अधिक स्थायित्व देती है और उनकी सफलता की गारंटी होती है. ऐसे उपायों से बच्चों की मौत को टाला जा सकता है बशर्ते सरकार अपने प्रयासों को असरकारी बनाना चाहे.(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

पंकज शुक्‍लापत्रकार, लेखक

(दो दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं. समसामयिक विषयों, विशेषकर स्वास्थ्य, कला आदि विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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