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इंदौर4 घंटे पहलेलेखक: राघवेंद्र बाबा
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- सेंट्रलाइज सिस्टम होने से भोपाल में लोकेशन समझाना पड़ता है मुश्किल
हाई लिंक सिटी में पिछले दिनों हुई डकैती के बाद पीड़ितों ने डायल 100 पर फोन लगाया। कॉल भोपाल में बैठे कंट्रोल रूम पर अटैंड हुआ। पीड़ित ने कॉलोनी का नाम बताया, लेकिन वह समझ नहीं पाया। फिर उसे इंदौर के एरोड्रम थाने की जानकारी दी, लेकिन वह गली और मोहल्ले की जानकारी लेता रहा।
करीब दस मिनट तक यही चलता रहा। आखिर झल्लाकर कॉलर ने फोन रखा और अपने रिश्तेदारों को फोन कर मदद मांग ली। डायल 100 को सूचना देने के बाद इस तरह लोकेशन समझाने का यह पहला मामला नहीं है। दरअसल, प्रदेश में वारदात कहीं भी हो, यदि आप डायल 100 पर फोन कर रहे हैं तो सबसे पहले आपको अपनी लोकेशन भोपाल में बैठे उस अनजान शख्स को बताना होगी, जो आपके शहर की पूरी जानकारी नहीं रखता है।
यदि आप लोकेशन समझाने में कामयाब रहे तो ठीक वरना आपके 10 मिनट तो लोकेशन समझाने में ही खराब हो जाएंगे। यह समस्या डायल 100 पर फोन लगाने वाले प्रदेश के 20 प्रतिशत लोगों के साथ आ रही है। कहा जा रहा है कि सिस्टम कॉलर की लोकेशन कैच नहीं कर पाता, इसलिए परेशानी आती है।
हर जिले में कंट्रोल रूम थे, तब परेशानी नहीं थी
डायल 100 के सेंट्रलाइजेशन होने से पहले जिलेवार कंट्रोल रूम थे। लोकल स्तर का पुलिसकर्मी ही लोगों की लोकेशन लेता था। उसे पता होता था कि उसके जिले में कौन सा इलाका कहां है। किस थाने को सूचना देना चाहिए। तब कॉलर और अटेंडर दोनों को स्थानीय जानकारी होने से काफी सहूलियत थी।
20% मामलों में लोकेशन ट्रेस करने में आती दिक्कत
डायल 100 के जनसंपर्क अधिकारी हेमंत शर्मा ने कहा अभी लोकेशन बाउंस होने या ट्रेस नहीं होने के कुछ मामले सामने आ रहे हैं। 20 प्रतिशत केस में ऐसा होता है। अकसर देखने में आता है कि बड़े शहरों में हर 100 मीटर पर गली बदल जाती है, इसलिए उनकी सही लोकेशन ट्रेस नहीं हो पाती। वैसे कंट्रोल रूम भोपाल में तकनीकी सिस्टम से 30 सेकंड बाद बात करने पर लोकेशन आ जाती है। फिर भी हम इसे और दुरुस्त करेंगे।