सच निकला शक: 22 दिन पहले जिस मेडिकल कॉलेज को सैंपलों की जांच में मिले 100% अंक, उसी ने विधायक को 41 घंटे में दी दो रिपोर्ट, पहले पॉजिटिव… फिर बताया निगेटिव

सच निकला शक: 22 दिन पहले जिस मेडिकल कॉलेज को सैंपलों की जांच में मिले 100% अंक, उसी ने विधायक को 41 घंटे में दी दो रिपोर्ट, पहले पॉजिटिव… फिर बताया निगेटिव


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रतलाम4 मिनट पहले

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  • जावरा के भाजपा विधायक डॉ. राजेंद्र पांडेय ने पहली रिपोर्ट पर उठाए थे सवाल, कहा था-विधानसभा जाने से रोकने के लिए बता दिया पॉजिटिव

रतलाम मेडिकल कॉलेज का नया कारनामा सामने आया है। कॉलेज की लैब ने दो दिन पहले जिस जावरा विधायक डॉ. राजेंद्र पांडेय को पॉजिटिव बताया, वे दोबारा जांच में निगेटिव आए हैं। इस पॉजिटिव-निगेटिव के फेर में वे विधानसभा सत्र में शामिल होने से चूक गए। बड़ा सवाल ये है कि वह विधायक हैं, इसलिए दोबारा जांच हो गई, उनका क्या… जिनके लिए प्रशासन का फैसला आखिरी होता है…?

विधायक डाॅ. पांडेय का कहना है कि उन्हें शॉर्ट टर्म में रिपोर्ट आ जाने और सीधेे सूचना नहीं देने से शक हुआ। प्रोटोकाल के तहत दूसरी रिपोर्ट निगेटिव होने पर भी 7 दिन क्वारेंटाइन रहना होगा। विधानसभा सत्र में मेडिकल कॉलेज व अन्य विभागों के मुद्दे रखवाए हैं। वर्चुअल शामिल होऊंगा। मेडिकल कॉलेज की लापरवाही दर्शाती है कि आम लोगों के साथ कोरोनाकाल में अमानवीय परिस्थितियां बनी। कलेक्टर को अवगत करा चुका हूं। उनकी जिम्मेदारी है। वे संज्ञान लें।

इधर, मामला हास्यास्पद बन चुका है, क्योंकि, रतलाम मेडिकल कॉलेज को 22 दिन पहले ही एक्सटर्नल क्वालिटी कंट्रोल प्रोग्राम में सैंपल जांच के लिए 100% अंक मिले हैं।

विधानसभा जाने से पहले नियमों का हवाला देते हुए जावरा विधायक डॉ. राजेंद्र पांडेय की 19 फरवरी को कोविड जांच हुई थी। 4 घंटे में मिले परिणाम में डॉ. पांडेय पॉजिटिव आए। डॉ. पांडेय ने जांच पर सवाल उठाए, उन्होंने मेडिकल कॉलेज की कमियां उजागर करने का बदला लेने की बात तक कही। विधायक की नाराजगी पर अगले ही दिन सीएमएचओ डॉ. प्रभाकर ननावरे टीम के साथ जावरा पहुंचे, दूसरी बार सैंपल लिया। रविवार को 41 घंटे बाद दूसरी रिपोर्ट में विधायक निगेटिव निकले जबकि दोनों जांचें आरटी-पीसीआर मशीन से की गई है।

हर महीने कॉलेज की होती है परीक्षा

  • विधायक की दो रिपोर्ट देख जिलेवासी कई सवाल उठा रहे हैं। सवालों के घेरे में काॅलेज की आरटी-पीसीआर मशीन है।
  • सैंपलों की जांच के लिए एक्सटर्नल क्वालिटी कंट्रोल प्रोग्राम होता है, इसमें अनजान सैंपलों को जांच के लिए कॉलेज भेजा जाता है। परिणाम बताने होते हैं।
  • एम्स की टीम हर महीने कॉलेज में कोरोना जांच प्रक्रिया की जांच करती है।
  • 30 जनवरी को हर तीन महीने में होने वाले एक्सटर्नल क्वालिटी कंट्रोल प्रोग्राम में कॉलेज ने 100% सैंपलों के सही परिणाम बताए हैं।

सबसे भरोसेमंद मशीन का ऐसा हाल… जबकि, ट्रूनॉट बंद, रैपिड एंटीजन किट के परिणाम शंकास्पद

1. ट्रूनॉट : चार महीने पहले तक जिला अस्पताल में इससे जांच की जाती थी। इसमें 1624 लोगों की जांच की थी। इसमें 132 पॉजिटिव निकले थे, इस मशीन पर आराेप अब तक नहीं लगे। हालांकि, इस मशीन से अब जांच बंद हो चुकी है।
2. रैपिड एंटीजन : इसमें किट से जांच करते हैं, रैपिड एंटिजन से अब तक 30,363 लोगों की जांच हो चुकी है। इसकी रिपोर्ट सबसे शंकास्पद है। अब तक कई मामले ऐसे आए हैं, जिनमें लोगों ने जांच पर सवाल उठाए हैं।
3. आरटी-पीसीआर : सबसे भरोसेमंद है। मेडिकल कॉलेज की वॉयरोलॉजी लैब में ये जांच होती है। रिपेार्ट मिलने में एक से दो दिन लगते हैं, अब तक 80,653 लोगों की जांच हो चुकी है।

बड़ा सवाल : विधायक थे… इसलिए मिला वीआईपी ट्रीटमेंट, शहर के ये मामले अब तक अन-सुलझे?

1. अगस्त में रतलाम के एक बड़े व्यापारी की इंदौर में मौत हो गई थी। उन्हें सर्दी थी, चेस्ट के एक्स-रे में संक्रमण दिखने के बाद मेडिकल कॉलेज गए। वहां से सामान्य लक्षण बताकर रेलवे अस्पताल भेजा, कोरोना की जांच में निगेटिव आए। जिला अस्पताल भेज दिया। स्थिति बिगड़ने पर परिजन इंदौर ले गए, जांच हुई तो पॉजिटिव निकले। मौत हो गई । 2. दिसंबर महीने में 50 साल के एक व्यक्ति की तबीयत बिगड़ी। कोरोना की आरटीपीसीआर जांच में रिपेार्ट निगेटिव मिली थी। हालांकि, डॉक्टर को विश्वास नहीं था, ऐसे में सीटी स्कैन करवाया। इसमें पॉजिटिव के लक्षण थे। पॉजिटिव मानकर उनका इलाज किया। इसी महीने एक 60 साल के व्यक्ति के मामले में भी ऐसा हुआ।

एक्यूरेसी 70% तक, ऐसा होना आश्चर्यजनक नहीं

आरटीपीसीआर की एक्यूरेसी 70% तक रहती है। कुछ मामलों में 30% तक भी देखी गई है। ऐसा होना आश्चर्यजनक नहीं है। इस मामले में एक ही लैब से दोनों रिपोर्ट मिली है, इसलिए अभी कुछ नहीं कह सकते। पॉजिटिव-निगेटिव आने के कई कारण रहते हैं। हम हर तीन महीने में लैब की क्वालिटी की जांच करते हैं। सरमन सिंह, डायरेक्टर, एम्स, भोपाल



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