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भोपालएक घंटा पहलेलेखक: भीम सिंह मीणा
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किसान जीवन सिंह
- शरीर से दिव्यांग, हौसले से बलवान 38 साल के किसान की जिंदादिल कहानी
- 30 एकड़ जमीन पर खुद करते हैं हकाई, बोवनी और कटाई
कहते हैं- अगर हौंसले बुलंद हों और इरादे मजबूत तो शारीरिक विकलांगता भी अपाहिज हो जाती है। यह बात औद्योगिक नगर मंडीदीप से सटे गांव हमीरी के 38 वर्षीय युवा किसान जीवन सिंह पर एकदम फिट बैठती है। जीवन जब छह वर्ष के थे तो अचानक एक दिन दौड़ते-दौड़ते गिर गए और फिर कभी पैरों पर खड़े नहीं हो पाए। पिता ज्ञान सिंह और माता मुन्नी बाई ने न जाने कितने डॉक्टर और मंदिरों के चक्कर लगाए। आखिर वे ठीक नहीं हुए, क्योंकि पोलियाे के कारण ऐसा हुआ था।
उस समय जीवन के साथ आसपास के इलाके में करीब आधा दर्जन लोगों को पोलियो हुआ था। उनके बड़े भाई अर्जुन सिंह और भारत सिंह उन्हें पीठ पर बैठाकर स्कूल ले जाते थे। लेकिन, जीवन को ऐसी जिंदगी रास नहीं आई। दस वर्ष की उम्र से उन्होंने बड़े भाई के साथ खेत पर जाना शुरू कर दिया। 18 साल की उम्र के बाद ट्रैक्टर के स्टेयरिंग संभाल लिए और अब पूरी खेती-बाड़ी संभालते हैं।
जीवन बताते हैं कि मुझे ट्रैक्टर, जीप चलाने की मनाही नहीं थी। शुरुआत में बहुत दिक्कत आई। पांव से एक्सीलेटर नहीं दबता था, लेकिन अब सब आसान लगता है। परिवार की 30 एकड़ जमीन है। इस पर हकाई, बोवनी और फसल कटने के बाद मंडी ले जाने का काम जीवन करते हैं। बड़ी बात यह है कि जिस मंडी में अच्छे-अच्छे ड्राइवर ट्राली नहीं लगा पाते, वहां जीवन बड़ी आसानी से यह काम कर लेते हैं।
सामान्य लाइसेंस नहीं मिला, इसलिए किसी को साथ बैठाकर चलाते हैं गाड़ी
जीवन ने वाहन चलाना शुरू किया और लाइसेंस बनवाने गए तो जवाब मिला कि विकलांग वाली गाड़ी का लाइसेंस बनेगा। लेकिन, उन्हें यह मंजूर नहीं थी, क्योंकि उन्होंने कभी तीन पहिया विकलांग गाड़ी नहीं चलाई। वे कहते हैं कि उनका टेस्ट ले लिया जाए और यदि वे फेल हो तो लाइसेंस न बने, सफल होने पर उन्हें सामान्य व्यक्ति की तरह लाइसेंस मिलना चाहिए। लेकिन, नियम इसकी मंजूरी नहीं देते। इस कारण जब कहीं शहर में जाते हैं तो अपने साथ एक लाइसेंस धारी को बैठाना पड़ता है।
18 की उम्र से चला रहे गाड़ियां, फिर भी नियमों के कारण अब तक सामान्य लाइसेंस नहीं मिल सका
हर कोई आश्चर्य से जीवन को देखता है और सवाल करता है कि वे पोलियाेग्रस्त होने के बाद भी कैसे ट्रैक्टर चला लेते हैं। जीवन ने इसका जवाब देते हुए दैनिक भास्कर को बताया कि एक बार ट्रैक्टर पर बैठने के बाद अपने पांव को क्लच और ब्रेक पर रख लेते हैं। इसके बाद गियर और हैंडल हाथ में होते हैं। जब क्लच या ब्रेक दबाना हो तो वे फूर्ति से अपने हाथ से पैर को घुटने पास से पकड़कर दबाते हैं। हाथ और पैर की मिश्रित ताकत से ट्रैक्टर चलता है। ऐसे ही जीप और एसयूवी यानी बड़ी कारें भी चलाते हैं।