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जबलपुर10 घंटे पहले
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प्रतिकात्मक फोटो
- प्रक्रियात्मक बातों को न्याय के आगे नहीं आना चाहिए
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए न्यायविदों ने कहा कि कई बार पुस्तक में लिखी बातें सटीक न्याय तक पहुँचने में रोड़ा बनती हैं, ऐसी परिस्थितियों में भी प्राथमिकता न्याय को ही देनी चाहिए। कुल मिलाकर प्रक्रियात्मक बातों को न्याय के आगे नहीं आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस रविंद्र भट्ट का कहना रहा कि इसके लिए देश भर की तमाम अकादमियाँ भविष्य में अपने-अपने अनुभवों को एक-दूसरे से साझा करेंगी, ताकि न्याय के पथ पर बेहतर से बेहतर परिणाम हासिल हो सके।
ऑल इंडिया ज्यूडिशियल एकेडमीज डायरेक्टर्स रिट्रीट के प्रशिक्षण सत्र में पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कभी ऐसा होता है कि प्रक्रिया ने अगर हाथ बाँध रखे हों तब भी न्याय को प्राथमिकता देना चाहिए, न कि प्रक्रिया को। निश्चित तौर पर जटिलताएँ हैं, उसका मंथन किया जाना चाहिए और उन्हें दूर करने के प्रयास भी होने चाहिए।
मप्र राज्य न्यायिक अकादमी में आयोजित प्रशिक्षण को संबोधित करते हुए विधि वेत्ताओं का कहना रहा कि कानून की परिधि में रहते हुए अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचे, इसके लिए और अधिक कारगर प्रयास होने चाहिए। न्याय हासिल करने के लिए और भी नए आयाम खोजने होंगे। प्रशिक्षण सत्र के पहले चरण को मप्र उच्च न्यायालय के जस्टिस तथा न्यायिक अकादमी के चेयरमैन प्रकाश श्रीवास्तव तथा अन्य विधि वेत्ताओं ने विचार रखे।
न्यायिक कार्य की जटिलताएं
न्यायाधीशों का कहना रहा कि प्रक्रियात्मक जटिलताओं में न्याय को नहीं बांधा जा सकता है। न्यायाधीशों को इससे मुक्त रखा जाना चाहिए। कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि कभी भी प्रक्रिया को न्याय के आड़े नहीं आना चाहिए। दूसरे सत्र में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता तथा मेघालय के चीफ जस्टिस विश्वनाथ तथा मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस शील नागू ने अपने विचार रखे।