अनुज गौतम, सागर: बुंदेलखंड के सागर जिले में सांपों को लेकर एक रहस्यमयी प्रथा सदियों से सक्रिय है: लोग इनके असली नाम तक नहीं लेते. यह कोई मज़ाक या अन्धविश्वास नहीं, बल्कि एक समझदारी भरी सांस्कृतिक आदत है, जो गहरी प्रेम, भय और सम्मान की भावनाओं से जूड़ी हुई है.
सागर एवं आसपास के इलाकों में 30 से ज्यादा सांप की प्रजातियाँ पाई जाती हैं. इनमें रसल वाइपर, कॉमन करेंत और खतरनाक किंग कोबरा जैसी जहरीली किस्में भी शामिल हैं. मगर किसानों के मित्र धामन और गरेता जैसी प्रजातियाँ खेतों में चूहों का शिकार कर फसल की रक्षा करती हैं. बुंदेलखंड में सांपों को दुश्मन मानने की जगह कई बार देवता जैसा सम्मान भी दिया जाता है.
नाम न लेने का पीछे का तर्क
70 वर्षीय द्रोपती बाई बताती हैं, “अगर ‘सांप’ नाम बार-बार लिया जाए तो मान लिया जाता है कि वह आसपास 100 गज के अंदर आ जाएगा. इससे घर के छोटे बच्चे तो दहशत में आ ही जाते हैं, बड़े-बूढ़े भी परेशान हो उठते हैं. इसलिए हम उसका नाम नहीं लेते.” लोग इसे ‘कीड़ा’, ‘बाबा’ या ‘जूजू’ कहे बिना नहीं माने. इस रूप से चर्चा करने पर सांप की उपस्थिति कल्पनात्मक होती है, और वह उस स्थान से दूर ही रहता है.
यह परंपरा बच्चों को सांप से दूर रखने के साथ-साथ समुदाय को एक सूक्ष्म चेतना भी देती है प्रकृति में संतुलन की ताकत का एहसास. अनेक बुजुर्ग मानते हैं कि नाम न लेने का संस्कार, सांप को आदिम शक्ति मानने का आदर व्यक्त करता है. डर और डरावनी कहानियों की जगह यह एक शांतिबोधक व्यवहार बन गया है.
बुंदेलखंडी संस्कृति की सीख
सड़क किनारे चढ़ते सांपों की न तस्वीर डालें, न उनके नाम का उल्लेख करें—यह डाँट-डपट नहीं, बल्कि समझदारी है. युवा पीढ़ी में यह भाव तब तक खुद-ब-खुद सिखा जाता है, जब तक कोई इसे तोड़ने की हिमाकत न करे. बुंदेलखंड की यह संस्कृति हमें सिखाती है कि भय को मिटाकर अगर हम सम्मान का भाव बना लें, तो आघात ही नहीं, जुड़ाव भी बन सकता है.
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