स्वाद का राजा… तीन पीढ़ियों वाला पेड़ा, न यूपी न बिहार, यहां 90 साल पुरानी दुकान के बाहर दिखेगी कतार

स्वाद का राजा… तीन पीढ़ियों वाला पेड़ा, न यूपी न बिहार, यहां 90 साल पुरानी दुकान के बाहर दिखेगी कतार


Khargone News: मिठाई का नाम सुनते ही मुंह में मिठास घुल जाती है. वहीं, जब बात पेड़े की हो तो पूछिए मत, गप से खाने का मन कर जाता है. वैसे तो पेड़े मथुरा के मशहूर हैं. लेकिन, अब यूपी-बिहार, राजस्थान के कई शहरों का पेड़ा प्रसिद्ध हो चुका है. पर, मध्य प्रदेश के शहर का पेड़ा, इन दिनों गदर काटे है. मुंह में जाते ही स्वाद का विस्फोट करता है. इस पेड़े का क्रेज इतना है कि ये शहर की पहचान बन चुका है. मंदिरों में भगवान को भोग लगाना हो या किसी बड़े अफसर की टेबल पर मिठास पहुंचानी हो, तो लोग सबसे पहले इसी पेड़े को ढूंढते हुए आते हैं.

खरगोन के सराफा बाजार में ‘कन्नू भाई पेड़े वाले’ के नाम से मशहूर एक दुकान है. यह दुकान कई वर्षों से अपनी पैठ जमाए हुए है. खास बात ये कि यहां सिर्फ और सिर्फ पेड़ा मिलता है. लेकिन, ऐसा पेड़ा, जिसे खा लेने वाला उसे फिर भूल नहीं पाता. स्वाद ऐसा कि हर जुबां पर चढ़ जाए. शहर के जज, कलेक्टर, एसपी भी यहीं का पेड़ा खाना पसंद करते हैं. 1938 से इसी जगह संचालित दुकान अब नितिन गुजराथी संभालते हैं. लेकिन, शुरुआत उनके दादा कन्हैयालाल गुजराथी ने की थी. शहर में लोग उन्हें कन्नू भाई कहते थे. वही नाम बाद में दुकान की पहचान बन गया।

तब 125 ग्राम का था एक पेड़ा
हालांकि, घर में पुराने लोगों से सुनी बातों के अनुसार, इससे भी पहले से तालाब चौक पर उनके परदादा मिठाई की दुकान चलाते थे. नितिन बताते हैं कि दादा कन्हैयालाल गुजराथी शुरुआत में दूध का व्यापार करते थे. गांवों से दूध लाकर शहर में बेचते थे. धीरे-धीरे दूध से मावा निकालने लगे और फिर उसी मावे से पेड़े बनाने शुरू किए. उस जमाने में पेड़ा आज की तरह छोटा नहीं होता था. एक पेड़ा करीब 125 ग्राम का होता था. थाल में रखकर बेचा जाता था.

दो वैरायटी में उपलब्ध
दुकान पर दो तरह के पेड़े बनाए जाते हैं. एक स्पेशल पेड़ा, जिसमें चीनी कम डाली जाती है और स्वाद मुलायम होता है. दूसरा नॉर्मल पेड़ा, जो थोड़ा ज्यादा मीठा होता है. दोनों ही वैरायटी के अपने-अपने ग्राहक हैं. कोई कम मीठा पसंद करता है तो कोई पारंपरिक स्वाद की तलाश में आता है. इन्हें कलर करने के लिए कोई केमिकल भी नहीं मिलाया जाता. प्राकृतिक रूप में ही बेचते हैं.

20 से 450 रुपये किलो तक का सफर
नितिन गुजराथी बताते हैं कि दादा के समय में पेड़ा 20 रुपये किलो बिकता था. आज 400 से 450 रुपये किलो बिकता है. महंगाई जरूर बढ़ी है, लेकिन मिठास वही पुरानी है. कई पुराने ग्राहक आज भी कहते हैं कि जैसे पहले खाते थे, वैसा ही स्वाद आज भी मिलता है. न शक्कर की मात्रा बदली है, न मावे की क्वालिटी बदली.

एक दिन में बनती है 40 किलो मिठाई
लोगों का भरोसा इसलिए भी है कि यहां मिलने वाला मावा कहीं से खरीदा नहीं जाता. दुकान में ही शुद्ध दूध से मावा तैयार किया जाता है. हर रोज करीब 40 किलो मावा बनाया जाता है. उसी से पूरी शुद्धता के साथ पेड़े तैयार होते हैं. देसी मावे को धीमी आंच पर लंबे समय तक सेंका जाता है. फिर उसमें इलायची और एक खास देशी सुगंध मिलाई जाती है, जो खाने के बाद देर तक जुबां पर रहती है.

9 दशक से बरकरार है स्वाद
इतना ही नहीं, पेड़े की बनावट, मिठास और टेक्सचर आज भी वैसा ही रखा गया है, जैसा 9 दशक पहले कन्नू भाई के ज़माने में था. बनाने के लिए कोई आधुनिक मशीन का उपयोग नहीं होता. बल्कि, वही पुरानी तसला-करछी का उपयोग होता है. अब चूल्हे की जगह गैस भट्टी ने ले ली है. यही कारण है कि शहर में इतनी दुकानें होने के बावजूद यहां का पेड़ा इतने वर्षों बाद भी अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध है.

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