18 की उम्र, रंगोली 8 फीट लंबी… लॉकडाउन में शुरू किया था, अब CM तक पहचान!

18 की उम्र, रंगोली 8 फीट लंबी… लॉकडाउन में शुरू किया था, अब CM तक पहचान!


खंडवा के एक युवा समूह ने रंगोली जैसे पारंपरिक कला को नए रूप में प्रस्तुत कर समाज में एक मिसाल कायम की है. कोरोना काल में शुरू हुए इस सफर को आज पहचान मिल रही है सरकारी कार्यक्रमों से लेकर धार्मिक स्थलों तक. विशेष बात यह है कि इस कला को पुरुषों द्वारा भी उतनी ही खूबसूरती से अपनाया गया है, जितनी महिलाओं द्वारा सदियों से की जाती रही है. इस ग्रुप का नेतृत्व कर रहे हैं समर गुप्ता, जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान यूट्यूब से रंगोली बनाना सीखा था.

लॉकडाउन के दौरान सीखा रंगोली बनाना
समर गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने रंगोली बनाना तब शुरू किया जब देश लॉकडाउन की स्थिति में था. यूट्यूब से सीखा, लेकिन शुरुआत में यह कला आसान नहीं थी. उन्होंने बताया कि शुरुआत में बहुत खराब बनती थी, लेकिन जैसे-जैसे रिपीट किया, प्रैक्टिस की, वैसे-वैसे परफेक्शन आता गया.
आज समर न सिर्फ पारंपरिक रंगोली बना सकते हैं बल्कि पोर्ट्रेट, स्केचेस और 7 से 8 फीट लंबी रंगोली भी तैयार कर लेते हैं. वे बताते हैं कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के आगमन पर आयोजित कार्यक्रम में रंगोली तैयार करने का अवसर उन्हें मिला था. इसके अलावा खंडवा के सुप्रसिद्ध संत दादाजी धूनीवाले मंदिर के भूमिपूजन कार्यक्रम में भी उन्होंने और उनके ग्रुप “हरियर ग्रुप” ने रंगोली तैयार की.

समर कहते हैं कि यह हमारे लिए बहुत गर्व की बात थी, इतने बड़े कार्यक्रम में हमें रंगोली बनाने का अवसर मिला, यह हमारे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था.

रंगोली बनाना सिर्फ महिलाओं का काम नहीं
रंगोली कला पर समाज की सोच को लेकर पूछे जाने पर समर बताते हैं कि भले ही यह परंपरागत रूप से महिलाओं से जुड़ी रही हो, लेकिन आज यह किसी लिंग तक सीमित नहीं है. उनके घर वाले और दोस्त उन्हें इस कार्य के लिए पूरा समर्थन देते हैं. उनका मानना है कि कला किसी की बपौती नहीं होती, यह हर किसी की होती है, बस लगन होनी चाहिए.
समर बताते हैं कि एक रंगोली को बनाने में मिनट नहीं बल्कि कई घंटे लगते हैं. सबसे ज्यादा ज़रूरी चीज़ होती है पेशेंस यानी धैर्य. अगर शुरुआत में ही कोई टूट जाए, तो फिर वो परफेक्शन तक नहीं पहुंच सकता.

बचपन से ही रंगोली बनाने में थी रूचि
प्रयाग राठौर बताते हैं कि रंगोली के प्रति उनके लगाव की शुरुआत बचपन से ही हुई थी. 7–8 साल की उम्र में वे त्योहारों के दौरान अपनी माँ की मदद करते थे. यहीं से उनका शौक पैदा हुआ. फिर स्कूल प्रोजेक्ट्स और ड्राइंग प्रतियोगिताओं में भाग लेकर उन्होंने रंगोली को निखारा और एक नए स्तर तक पहुंचाया.
समर का ग्रुप “हरियर ग्रुप” जिसमें यश कुशवाहा, प्रयाग राठौर, भूमिका दरवारी और खुशी गुप्ता शामिल हैं, अब खंडवा के कई कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके हैं. सभी सदस्य मिलकर आयोजन से पहले थीम, डिज़ाइन और रंगों का चयन करते हैं, और कार्यक्रम में जान डाल देते हैं.
उनका सपना है कि यह ग्रुप भविष्य में भी बड़े आयोजनों का हिस्सा बने और निमाड़ की सांस्कृतिक परंपराओं को नई पहचान दिलाए. साथ ही वे यह संदेश देना चाहते हैं कि पारंपरिक कला को न केवल संरक्षित करना जरूरी है बल्कि इसे नए जमाने के साथ जोड़ना भी आवश्यक है.
समर गुप्ता जैसे युवा कलाकार हमें यह दिखाते हैं कि परंपरा और नवाचार साथ-साथ चल सकते हैं, बस ज़रूरत है जुनून, समर्पण और हिम्मत की. खंडवा जैसे शहर से निकलकर जब युवा अपनी कला से देश-दुनिया में नाम कमा रहे हैं, तो यह क्षेत्र के लिए भी गर्व का विषय बन जाता है.

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