बीती रात 4 साल की आलिया मंसूरी की मौत हो गई. उसे 23 जून को कुत्ते ने काटा था. शनिवार रात तबीयत बिगड़ने के बाद उसे जिला अस्पताल से इंदौर रेफर किया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया. परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया. खरगोन कोतवाली थाना क्षेत्र के संजय नगर में 23 जून को करीब एक दर्जन लोगों को कुत्तों ने काटा था. आंकड़ों की बात करें, तो अप्रैल से जून के बीच खरगोन जिले में 1677 और बड़वानी जिले में 1783 डॉग बाइट के मामले दर्ज किए गए. कुछ घटनाओं में एक ही कुत्ते ने कम समय में कई लोगों को काटा. इन हमलों ने लोगों में डर का माहौल बना दिया है. खासतौर पर छोटे बच्चों और महिलाओं का अकेले बाहर निकलना मुश्किल हो गया है. स्थानीय प्रशासन के निर्देश पर नगर पालिकाओं ने कुत्तों को पकड़ने की कार्रवाई शुरू की है लेकिन फिलहाल यह पर्याप्त साबित नहीं हो रही.
कुत्तों के अचानक आक्रामक हो जाने के कारणों को समझने के लिए हमने वेटनरी असिस्टेंट सर्जन डॉ खेमेंद्र रोकड़े से बात की. उन्होंने लोकल 18 को बताया कि यह सोचना गलत है कि सिर्फ पागल कुत्ता ही काटता है. दरअसल गर्मी खत्म होने और बारिश शुरू होने के समय कुत्तों के व्यवहार में कई बदलाव आते हैं. भोजन और पानी की कमी, रहने की असुरक्षा, हार्मोनल बदलाव और गर्मी के मौसम में कोर्टिसोल स्तर का बढ़ना ऐसे कारक हैं, जो उन्हें चिड़चिड़ा और आक्रामक बना देते हैं. यही वजह है कि वे अपने इलाके में किसी को भी घुसता देख हमला कर बैठते हैं.
डॉ रोकड़े ने कहा कि कई मामलों में कुत्ते किसी बीमारी के शिकार नहीं होते बल्कि उनका व्यवहारिक बदलाव ही हमलों की मुख्य वजह होता है. हालांकि अगर कोई कुत्ता रेबीज से संक्रमित हो जाता है, तो उसका व्यवहार बेहद हिंसक हो जाता है और वह सामने दिखने वाली हर वस्तु या जीव पर हमला कर सकता है. वर्तमान में जो केस सामने आ रहे हैं, उनमें अधिकतर कुत्तों के गुस्से की वजह भोजन की कमी, असुरक्षित और खुद को उपेक्षित महसूस करना है न कि रेबीज.
रोकथाम के लिए क्या करें?
उन्होंने आगे कहा कि ऐसी घटनाओं से बचने के लिए जरूरी है कि स्ट्रीट डॉग्स को समय-समय पर खाना-पानी दिया जाए और उनके लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए. इससे वे खुद को असहाय नहीं समझेंगे और हमला करने की प्रवृत्ति कम होगी. छोटे बच्चों को अकेले ऐसे स्थानों पर न भेजा जाए, जहां कुत्तों की संख्या ज्यादा हो या उनका ठिकाना हो. कुत्तों को देखकर भागने की बजाय शांत रहना और आंख मिलाने से बचना चाहिए, जिससे वे खुद को असुरक्षित महसूस न करें.
काटने की स्थिति में तुरंत उपचार जरूरी है. खरगोन जिला अस्पताल के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ अमर सिंह चौहान लोकल 18 को बताते हैं कि काटने पर तुरंत एंटी रेबीज इंजेक्शन दिया जाता है. जरूरत पड़ने पर इम्यूनोग्लोबिन, एंटीबायोटिक और टिटनेस का इंजेक्शन भी लगाया जाता है. चूंकि कई बार कुत्ता पकड़ में नहीं आता, इसलिए उसकी स्थिति की जांच संभव नहीं हो पाती, ऐसे में पूरा उपचार जरूरी हो जाता है.
एक साल में 22 लाख मामले
देशभर में यह समस्या बड़ी होती जा रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में भारत में करीब 22 लाख डॉग बाइट के केस सामने आए थे. सरकार ने 2030 तक देश को रेबीज मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है लेकिन मौजूदा हालात इस दिशा में बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं. खरगोन और बड़वानी जैसे जिलों की घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल सरकारी कार्रवाई नहीं बल्कि सामूहिक जागरूकता और जिम्मेदारी भी जरूरी है.