17 साल बीत चुके हैं, लेकिन न तो दिलीप का कोई सुराग मिला है, न ही कोई न्याय. दिलीप की पत्नी पद्मा आज भी उन्हें जीवित मानती हैं. वे हर रोज़ सिंदूर लगाती हैं, मंगलसूत्र पहनती हैं और करवा चौथ, वट सावित्री जैसे व्रत करती हैं. उनका कहना है, “जब तक भगवान खुद आकर मुझे न कहें, मैं दिलीप के लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ूंगी.”
दिलीप के पास कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. वे सिर्फ अपने परिवार के लिए मेहनत करते थे. जिस मकान में वे रहते थे, उसका संबंध बाद में मालेगांव ब्लास्ट से जुड़ने वाले लोगों से निकला — परिवार को लगता है कि इसी वजह से उन्हें उठा लिया गया.
हिम्मत अब 21 साल का हो चुका है, मोबाइल रिपेयर की दुकान में काम करता है और पढ़ाई भी कर रहा है. उसने कहा, “मेरे पास स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं थे, न ही खुद का घर. पर किसी ने मदद नहीं की.”
पद्मा कहती हैं, “जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, मैं अंतिम संस्कार जैसे कर्म नहीं करूंगी. न मैं विधवा हूं, न पत्नी — मैं अधूरी हूं.”