बलराम धनालाल हर दिन साइकिल से अपने गाँव से खंडवा शहर तक 30 किलोमीटर का सफर तय करते हैं. उनका यह सफर केवल शारीरिक दूरी तय करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति उनके अटूट समर्पण और अनुशासन को भी दर्शाता है. आज भी वे एक कुशल मिस्त्री के रूप में काम करते हैं और अपनी कमाई से आत्मनिर्भर हैं.
जब उनसे उनकी फिटनेस का राज पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इसमें कोई राज नहीं है, यह तो मेरे जीवन का हिस्सा है. उनकी दिनचर्या की शुरुआत सुबह 4 बजे से हो जाती है. वे ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, ठंडी हवा में टहलते हैं, और स्नान के बाद डेढ़ घंटा भगवान का जाप करते हैं. उनका मानना है कि यह ध्यान और आध्यात्मिकता उन्हें मानसिक शांति और ऊर्जा प्रदान करता है.
खान-पान का राज
बलराम धनालाल अपने खान-पान को लेकर बहुत सजग हैं. वे शुद्ध देसी घी का सेवन करते हैं और उनके भोजन में केवल सब्जी, रोटी, दाल और चावल शामिल होता है. वे तला हुआ या मसालेदार भोजन नहीं करते. उनका कहना है कि सादा और पौष्टिक भोजन ही उन्हें स्वस्थ और ऊर्जावान रखता है.
बलराम धनालाल रोज सुबह 15 से 20 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं. वे रोहणी से जावर और फिर जावर से सहजला तक साइकिल से जाते हैं. उनके बच्चे चाहते हैं कि वे मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करें, लेकिन उन्हें मोटरसाइकिल चलाना नहीं आता और ना ही उन्हें उसकी जरूरत महसूस होती है. उनके लिए साइकिल केवल एक साधन नहीं, बल्कि उनकी सेहत और जोश का प्रतीक है.
पेशे से बढ़ई
पेशे से बलराम धनालाल एक बढ़ई हैं. पुराने जमाने की तरह, वे आज भी मशीनों के बजाय हाथ से काम करते हैं. वे कुल्हाड़ी और वसूले से लकड़ी छीलकर सोफा, पलंग, कुर्सी, टेबल और स्टूल जैसी चीजें बनाते हैं. उनका कहना है कि मशीनों से काम आसान हो गया है, लेकिन हाथ से काम करने में जो संतुष्टि और गुणवत्ता मिलती है, वह मशीनों से नहीं मिल सकती.
बलराम धनालाल की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में सक्रिय और अनुशासित रहना कितना महत्वपूर्ण है. उनकी कहानी से प्रेरणा लेकर हम अपनी जीवनशैली में सुधार कर सकते हैं और एक स्वस्थ व ऊर्जावान जीवन जी सकते हैं. उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि आप खुद पर विश्वास रखें और अपनी सेहत का ध्यान रखें, तो उम्र कभी भी आपके सपनों और काम के आड़े नहीं आती.