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हिंदू धर्म में तुलसी को पूजनीय माना गया है. वहीं आयुर्वेद में यह एक औषधि है. आयुर्वेदिक दवाइयों में इसका उपयोग होता है. अब कई किसान तुलसी की खेती करके बेहतर आमदनी भी कमा रहे है. खरगोन जिले में अब कुछ किसान पारंपरिक फसलों की बजाय तुलसी जैसी औषधीय फसल की ओर रुख कर रहे हैं.
तुलसी का पौधा भारतीय संस्कृति में न केवल पूजनीय है, बल्कि इसके औषधीय गुणों ने इसे खेती के लिहाज से भी लाभदायक बना दिया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर में तुलसी का होना शुभ माना जाता है और यह वातावरण को शुद्ध करने में भी सहायक होती है. अब इसी तुलसी को कई किसान आय का अच्छा स्रोत बना रहे हैं.

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में अब कुछ किसान पारंपरिक फसलों की बजाय तुलसी जैसी औषधीय फसल की ओर रुख कर रहे हैं. जिले के मातमुर गांव में किसान राघव देवस्थले तुलसी की खेती से लाखों रुपए कमा रहे हैं. उन्होंने बताया कि तुलसी की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देती है.

राघव देवस्थले ने आधा बीघा जमीन पर तुलसी की जैविक खेती की है. उनका कहना है कि तुलसी की पहली कटाई 60 से 70 दिन में हो जाती है और सालभर में तीन से चार बार कटाई संभव है. एक सीजन में वे तुलसी बेचकर करीब 1 लाख रुपए तक की कमाई कर लेते हैं.

कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि तुलसी की कई किस्में होती हैं, जैसे – राम तुलसी, श्याम तुलसी और वन तुलसी आदि. इनमें राम तुलसी की मांग सबसे अधिक है क्योंकि इसका उपयोग दवाइयों और आयुर्वेदिक तेलों में ज्यादा होता है. तुलसी की पत्तियों से लेकर उसका अर्क तक बाजार में बिकता है.

सबसे खास बात ये है कि तुलसी की खेती किसी भी तरह की मिट्टी मे की जा सकती है. बीज से पौध तैयार कर 25 से 30 दिन बाद खेत में रोपाई की जाती है. यह पौधा ज्यादा पानी नहीं चाहता, लेकिन शुरू के 15 दिनों तक सिंचाई जरूरी होती है.

वहीं, राघव बताते हैं कि जैविक खाद जैसे वर्मी कम्पोस्ट और गोबर की खाद का प्रयोग तुलसी के लिए सर्वोत्तम होता है. तुलसी में खास कीट नहीं लगते, लेकिन बारिश के मौसम में पत्तियों पर फफूंदी आ सकती है, जिसे जैविक फफूंदनाशक से नियंत्रित किया जा सकता है.

तुलसी की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसकी फसल की खरीद के लिए आयुर्वेदिक कंपनियां, दवा निर्माता संस्थाएं और निजी व्यापारी पहले से संपर्क कर लेते हैं. खरगोन के नजदीक इंदौर सहित कई जिलों में तुलसी की मांग अधिक रहती है.

बता दें कि, औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि और उद्यानिकी विभाग कई योजनाएं चला रहा है. किसान इन योजनाओं के अंतर्गत अनुदान, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्राप्त कर सकते हैं. इच्छुक किसान जिला कृषि अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं.