सिंगरौली जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर पिपरा झापी गांव है। यहां की एक पहाड़ी की चोटी पर झांपी मैया का मंदिर है। यहां की खासियत यह है कि मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्ति नहीं है, लेकिन जन्माष्टमी पर हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। शनिवार क
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धरातल से मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को एक घंटे का समय लगता है। यहां तक पहुंचने के लिए दुर्गम रास्ते से गुजरना पड़ता है। भक्त झापी मैया का जलाभिषेक करते हैं, फूल चढ़ाते हैं और दीपक जलाकर उनकी आराधना करते हैं। इस दिन सुबह से लेकर शाम तक भजन-कीर्तन और प्रसाद बांटने का सिलसिल चलता है।
मंदिर से जुड़े लक्ष्मण प्रसाद मिश्र ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि झांपी मैया सभी की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। यही वजह है कि यहां सांसद, विधायक भी दर्शन के लिए आते हैं। पूर्व विधायक सुभाष रामचरित्र वर्मा ने भी यहां दर्शन किए। उन्होंने कहा कि वह हर जन्माष्टमी पर आते हैं, क्योंकि यहां आकर उन्हें बहुत शांति और सुकून मिलता है।
बर्तन मिलने की प्राचीन किंवदंती
मंदिर से एक किंवदंती भी जुड़ी है। पुराने लोग बताते हैं कि पहले यहां लोगों को जरूरत के हिसाब से बर्तन मिलते थे, जिन्हें इस्तेमाल करने के बाद वापस मंदिर में ही रख दिया जाता था। हालांकि, जब लोगों में लालच आया तो यह सिलसिला बंद हो गया। इस बात का कोई लिखित प्रमाण नहीं है। इस मंदिर का निर्माण करीब 40 साल पहले स्थानीय लोगों और सरई इलाके के कुछ व्यापारियों ने मिलकर कराया था।
श्रद्धालु करिश्मा साकेत ने बताया- मैं यहां हर जन्माष्टमी के दिन आती हूं। उपवास रखती हूं, अगर यहां रास्ता और बेहतर हो जाए तो आने-जाने में आसानी हो जाएगी। कुछ जगह सीढ़ियां बनी हैं। कुछ और बन जाएं तो लोग आसानी से मंदिर तक पहुंचे जाएंगे।



