कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस कीट पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो यह पूरी फसल को चौपट कर सकता है. इसलिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे बीमारी की सही पहचान करें और तुरंत बचाव के उपाय अपनाएं.
दरअसल, मिलिबग एक तरह का सफेद रूई जैसा कीट है. ये पौधों के पत्तों, तनों और कोमल हिस्सों पर चिपककर उनका रस चूस लेते हैं. इनके हमले से पौधों की ग्रोथ रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरी फसल कमजोर हो जाती है. कपास और सोयाबीन जैसी फसलें इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं.
विशेषज्ञ बताते हैं कि ये कीट खासतौर पर तब ज्यादा फैलते हैं जब मौसम में नमी ज्यादा हो और तापमान भी बढ़ा हुआ हो. यानी मानसून और खरीफ के दौरान ये फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं.
अगर आपके खेत में पत्तियां मुड़ रही हैं, पीली होकर सूखने लगी हैं या पौधों पर रूई जैसे सफेद धब्बे दिखाई दे रहे हैं, तो समझ लीजिए कि मिलिबग ने कब्जा कर लिया है. इतना ही नहीं, जहां ये कीट होते हैं वहां अक्सर चींटियां भी नजर आती हैं क्योंकि मिलिबग एक मीठा तरल छोड़ते हैं जिस पर चींटियां आकर्षित हो जाती हैं.
बचाव के उपाय
कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह किसानों को सलाह देते हैं कि सबसे पहले खेत की नियमित निगरानी करें. जैसे ही किसी पौधे पर कीट का असर दिखे, उसे तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें ताकि बीमारी फैल न सके.
कीटनाशक का उपयोग: इमिडाक्लोप्रिड और थायमेथॉक्सम जैसे कीटनाशक भी मिलिबग पर कारगर हैं. लेकिन इनका छिड़काव सही मात्रा और समय पर करना बेहद जरूरी है.
पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं: संतुलित खाद और सही सिंचाई देने से पौधे मजबूत होते हैं और बीमारी का असर कम होता है. कुल मिलाकर, अगर किसान सतर्क रहें और शुरुआत में ही इन कीटों पर नियंत्रण कर लें, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है. वरना ये सफेद रूई जैसे छोटे-छोटे कीट लाखों का घाटा करा सकते हैं.