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Asharam Phulmare Story: बालाघाट का भारत छोड़ो आंदोलन में बड़ा योगदान रहा. 20 अगस्त 1942 को वारासिवनी में रैली के दौरान अंग्रेजों की गोली से 22 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी दशाराम फुलमारी शहीद हो गए. जानिए बालाघाट …और पढ़ें
इस व्यापक आंदोलन को दबाने के लिए लाठीचार्ज और गोलीबारी करना शुरू भी कर दिया. इतने जतन के बाद भारत को आजादी मिली थी. आजादी की लड़ाई में बालाघाट का खून भी शामिल है. भारत छोड़ों आंदोलन की आंच बालाघाट में देखने को मिली. जानिए इसका पूरा इतिहास…
8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी. इसी दौरान गांधी ने करो या मरो का नारा भी दिया था. ये सही मायने में जन आंदोलन था. इसकी गूंज पूरे भारत में भी थी. गांव क्या शहर क्या हर जगह रैली और आंदोलन हो रहे थे. एक ऐसी ही रैली 20 अगस्त 1942 को बालाघाट जिले के वारासिवनी शहर में हो रही थी. यहां पर स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों की छावनी के आगे से गुजर रहे थे. सभी की जुबां पर नारे थे, अंग्रेजों भारत छोड़ो… भारत माता की जय…अंग्रेजों भारत छोड़ो….इतने में अंग्रेज अफसर ने गोलियां चलाने का आदेश दिया और उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. इतने में स्वतंत्रता सेनानी तीतर बितर हो गए, लेकिन एक गोली 22 साल के दशाराम फूलमारी को लगी और वह शहीद हो गए. अब वारासिवनी के उस चौक को गोलीबारी चौक के नाम से जाना जाता है.
बालाघाट से मिले 365 स्वतंत्रता सेनानी
वर्तमान का बालाघाट जिला अंग्रेजी शासन के सीपी यानी सेंट्रल प्रोविंस के तहत आता था, जिसकी राजधानी नागपुर थी. बालाघाट सीपी एंड बरार के महाकौशल क्षेत्र में आता था. यहां से ही सबसे ज्यादा 365 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बालाघाट जिले से थे. इसमें भी बालाघाट के वारासिवनी शहर से 92 स्वतंत्रता सेनानी निकले थे. ऐसे में वारासिवनी को स्वतंत्रता सेनानियों के शहर के नाम से जाना जाता है. वहीं, भारत छोड़ो आंदोलन का असर भी इसी शहर पर सबसे ज्यादा पड़ा.
भारत छोड़ो आंदोलन की लड़ाई में एक 22 साल का लड़का भी शामिल था, जिसने अपने प्राण न्योछावर कर दिए. उनका नाम दशाराम फुलमारी उर्फ दाखिया था. उनका जन्म बालाघाट के वारासिवनी में 1920 को हुआ था. वह एक किसान परिवार के थे. दशाराम फुलमारी आजादी की लड़ाई में समय-समय पर आंदोलनों में सक्रिय थे. 20 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद हुए थे. आज उनकी पुण्यतिथि है. गोलीबारी चौक में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गई है.
शहीद क्रांतिकारी के वंशज नाराज
दशाराम का परिवार आज भी वारासिवनी के वार्ड नंबर 13 में रहता है. दशाराम की बेटी का देहांत हो चुका है. वहीं, उनका भतीजा भी वहीं रहता है. उनके परिवार का कहना है कि हर साल मीडिया के लोग आते हैं. लेकिन किसी प्रकार की मदद नहीं मिली. उनका कहना है कि बीड़ी कारखाने के पास उनकी शहादत हुई थी. ऐसे में वहां पर उनका एक स्मारक था. लेकिन बीते कुछ समय से वह भी कहा पता नहीं. वहीं, हमने दशाराम प्रवेश द्वार बनाने की मांग की थी लेकिन वह भी पूरी नहीं हो पाई है. इसके अलावा आयोजकों उनकी बर्सी पर अब बुलाते ही नहीं है.
Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 6 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें
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